बलिया के मास्टर साहब की 'रस रसीली होली'
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रस रसीली होली
भरा रस महुआ फूल
कलियां हो गयी रसीली
पुरातन सखा बने परदेशी
मंजर आम चिढ़ाते।
फाग सुना मन यू पी वाला
रग-रग रस रंग भर दे
हुआ मन मद मस्त पवन से
सुरभि हुई मतवाली।
दिखे क्षेत्र हरे रंग, रंगों में
अलसी फूलवा रंगे किनारे
दिखा सफेद मटर गश्ती करते
बहुरंगी रंगों में यारों।
रंग आनेक है होली एक है
ढूंढते रंग, रंगों का प्यार
पर्ण डाल को छोड़ चुके है
नयी पत्तियाँ पवन झकोर।
प्रियदर्शी प्रिय नयन पर नाज
होली खेलें श्यामल के साथ
बहुरंगी बहुरूप बन गया
कजरा के पर रंग चढ़ गया।
आर.कान्त
शिक्षक, बलिया

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