यूपी बजट को पूर्व नेता प्रतिपक्ष रामगोविन्द चौधरी ने बताया आंकड़ों का इंद्रधनुष और हकीकत की धुंध

यूपी बजट को पूर्व नेता प्रतिपक्ष रामगोविन्द चौधरी ने बताया आंकड़ों का इंद्रधनुष और हकीकत की धुंध

बलिया : उत्तर प्रदेश की राजनीति और अर्थनीति में 'बजट' अब वित्तीय विवरण नहीं, बल्कि एक भव्य 'इवेंट' बन चुका है। जब विधानसभा में भारी-भरकम आंकड़ों का पिटारा खुलता है, तो हेडलाइंस "ऐतिहासिक" और "रिकॉर्ड तोड़" जैसे शब्दों से भर जाती हैं। सवाल यह है कि क्या इन गुलाबी आंकड़ों की चमक उन गड्ढों को भर पा रही है, जो प्रदेश की सड़कों पर सालों से अपनी पहचान बनाए हुए हैं।

विज्ञापनों का विकास बनाम धरातल की दौड़
सरकार का दावा है कि उत्तर प्रदेश 'एक्सप्रेसवे प्रदेश' बन चुका है। इसमें कोई दो राय नहीं कि बुनियादी ढांचे पर काम हुआ है, लेकिन विज्ञापनों में जिस रफ्तार से विकास दौड़ता नजर आता है, वह अक्सर ग्रामीण संपर्क मार्गों पर आकर दम तोड़ देता है। बजट का एक बड़ा हिस्सा चमचमाती परियोजनाओं पर खर्च होता है, जबकि आम आदमी की रोज़मर्रा की ज़िंदगी आज भी टूटी सड़कों और जलभराव जैसी बुनियादी समस्याओं से जूझ रही है।

बेरोजगारों की उन डिग्रियों का जिक्र है, जो अलमारी की शोभा बढ़ा रही हैं। सरकारी डेटा जब 'बेरोजगारी दर' में गिरावट दिखाता है, तो वह उन करोड़ों युवाओं की हताशा को दर्ज करना भूल जाता है जो एक अदद सरकारी भर्ती की परीक्षा होने और उसका परिणाम आने के इंतजार में अपनी उम्र गुजार रहे हैं। जब युवा रोजगार मांगता है, तो उसे 'आत्मनिर्भरता' का उपदेश दिया जाता है, जो सुनने में तो स्वाभिमानी लगता है, पर बिना संसाधन और अवसर के यह केवल एक पल्ला झाड़ने जैसा प्रतीत होता है।

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लोकतंत्र में बजट जनता की बेहतरी का रोडमैप होना चाहिए, न कि केवल चुनावी गणित को साधने का एक जरिया

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"जुमलों की खेती लहलहाई, कागज़ हुए हरे-भरे" यह दर्शाती है कि जब तक बजट का प्रभाव आम आदमी की क्रय शक्ति और जीवन स्तर में सुधार के रूप में नहीं दिखेगा, तब तक इसे 'कागजी जादूगरी' ही कहा जाएगा।

उत्तर प्रदेश का बजट 2026-27 : चुनावी लुभावन बजट, जमीनी हकीकत से दूर
यह बजट योगी सरकार के दूसरे कार्यकाल का आखिरी पूरा बजट है और 2027 विधानसभा चुनाव से ठीक पहले आया है। 10 लाख रोजगार, बेटियों की शादी में 1 लाख रुपये, स्कूटी, टैबलेट जैसी घोषणाएं सिर्फ वोट बैंक साधने के लिए हैं। पिछले 9 सालों में ऐसी हजारों घोषणाएं हुईं, लेकिन ज्यादातर कागजी ही रहीं। नौकरी के नाम पर फर्जी लिस्ट, शादी मदद में भ्रष्टाचार और स्कूटी वितरण में घोटाले की शिकायतें आम हैं।

किसानों के लिए सिर्फ जुमले, असली दिक्कतें अनसुलझी
किसानों को मुफ्त बिजली या रिकॉर्ड भुगतान का ढोल पीटा जा रहा है, लेकिन गन्ना किसानों का बकाया अब भी करोड़ों में है, MSP पर खरीदारी नहीं हो रही, और फसल बीमा क्लेम में भारी कटौती होती है। बजट में कृषि पर 9% से कम आवंटन है—यह विकास का दावा करने वाले राज्य के लिए बहुत कम है। असल में किसान आत्महत्या और कर्ज में डूबे हुए हैं, लेकिन बजट में सिंचाई, कोल्ड स्टोरेज या बाजार सुधार पर ठोस कदम नहीं।

युवाओं को 10 लाख नौकरियां? सिर्फ आंकड़ों का खेल
10 लाख रोजगार देने का दावा किया गया है, लेकिन पिछले बजटों में भी ऐसे वादे हुए—नतीजा? बेरोजगारी दर ऊंची है, सरकारी भर्तियां रुकी हुई हैं, और निजी क्षेत्र में निवेश के दावे ज्यादातर MOUs तक सीमित हैं (जो अमल में नहीं आते)। युवा अभी भी परीक्षा पेपर लीक, भर्ती घोटालों और बेरोजगारी से परेशान हैं। टैबलेट/स्किल डेवलपमेंट के नाम पर सिर्फ फोटो सेशन होते हैं।

महिलाओं के लिए दिखावा, सुरक्षा और असली सशक्तिकरण पर खामोशी
शादी में 1 लाख, स्कूटी और कौशल केंद्रों की बात अच्छी लगती है, लेकिन UP में महिलाओं के खिलाफ अपराध (बलात्कार, घरेलू हिंसा) अभी भी बहुत ऊंचे हैं। बजट में पुलिस सुधार या महिला हेल्पलाइन पर ठोस फंड नहीं। सशक्तिकरण के नाम पर सिर्फ कैश ट्रांसफर और स्कूटी—जो अक्सर चुनावी फायदे के लिए इस्तेमाल होती हैं, लेकिन लंबे समय तक रोजगार या सुरक्षा नहीं देतीं।

इंफ्रास्ट्रक्चर पर फोकस, लेकिन असमान विकास 
सड़क, ब्रिज और एक्सप्रेसवे पर करोड़ों खर्च का दावा है, लेकिन पूर्वांचल और बुंदेलखंड जैसे पिछड़े इलाकों में सड़कें टूटी हुई हैं, अस्पतालों में डॉक्टर नहीं, स्कूलों में शिक्षक नहीं। बजट का बड़ा हिस्सा लखनऊ-नोएडा जैसे शहरों पर जाता है—ग्रामीण क्षेत्रों में बिजली-पानी-शिक्षा की मूलभूत समस्याएं जस की तस हैं।

यह "कागज का बजट" है—बड़ी-बड़ी घोषणाएं, लेकिन अमल में भ्रष्टाचार, ठेकेदारों की लूट और फंड का गबन। पिछले बजटों में भी शिक्षा-स्वास्थ्य पर कम खर्च हुआ, और पूंजीगत व्यय के दावे सिर्फ कागज पर रह गए। राजकोषीय घाटा 3% पर रखने का दावा है, लेकिन असल में कर्ज बढ़ रहा है।

योगी सरकार के इस बजट को "चुनावी तोहफों की बारिश" कहा जा सकता है, जो अल्पकालिक खुशी देता है लेकिन लंबे समय तक रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य और किसानों की असली समस्याओं का समाधान नहीं करता। यह सिर्फ "जुमलों का बजट" है, जो जनता को बेवकूफ बनाने की कोशिश है। 

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