अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर बलिया की नेहा यादव की पुकार... सुनों स्त्री



सुनो स्त्री !
जब तुम माथे पर कुमकुम लगाती हो, तो तुम कमजोर नहीं, मानो रणभूमि के लिए तिलक सजाती हो।
जब सम्भाल लेती हो काँच की चूड़ियाँ लाख मशक्कतों में भी,
तब तुम सिर्फ़ नाजुक नहीं अपने अदम्य सामर्थ्य को झलकाती हो।
सम्भाले रखती हो सिर पर आँचल जब,
तब तुम कोमल नहीं, उदण्ड हवाओं को भी उनकी औकात बताती हो।
सुनो स्त्री !
कमजोर कहाँ हो तुम, तुम तो कृष्ण को राधाकृष्ण व शिव को सम्पूर्ण बनाती हो।
त्याग की मूरत हो तुम, छोड़ अपना बाबुल घर, घर पिया का परिपूर्ण बनाती हो।
सासू सोती कब, ससुर जगते कब, ये बात घर में सिर्फ़ तुम जानती हो।
सिर्फ़ खाना बनाना ही नहीं जानती, एक मकान में कुछ जन मिलाकर उसे घर परिवार बनाती हो।
सुनो स्त्री !
जब खड़ी होती हो तुम किसी पुरुष के पीछे तो तुम अबला नहीं, उसकी ढाल बन जाती हो।
कर लिए मज़बूत इरादे गर, तो भेदी जा न सके, ऐसी खाल बन जाती हो।
सीमित नहीं रही अब तुम सकरे झरोखे में, अब तुम अंतरिक्ष भी सजाती हो।
सुनो स्त्री !
तुम्हारी चूड़ियों की खनक से तलवार की झंकार आती है,
तुम्हारे पायल की झुनझुनी शिव डमरू की टंकार गाती है।
तुम रुक नहीं सकती, तुम झुक नहीं सकती, तुम कुढ़ नहीं सकती,
याद रखो जननी हो तुम, तुम्हारे जनने से ही श्रृष्टि में जान आती है।
के.एम. नेहा यादव

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