बजट पर पूर्व मंत्री रामगोविन्द चौधरी की तीखी प्रतिक्रिया, बोले...

बजट पर पूर्व मंत्री रामगोविन्द चौधरी की तीखी प्रतिक्रिया, बोले...

बलिया : केन्द्र सरकार के 9वें बजट पर पूर्व मंत्री रामगोविन्द चौधरी ने प्रतिक्रिया दी है। सपा के वरिष्ठ नेता ने कहा कि हर साल जब वित्त मंत्री लाल ब्रीफकेस या अब डिजिटल टैबलेट लेकर संसद की सीढ़ियां चढ़ती हैं, तो देश के करोड़ों लोगों की निगाहें इस उम्मीद में टिकी होती हैं कि शायद इस बार उनकी थाली में रोटी और जेब में कुछ बचत के अवसर बढ़ेंगे।लेकिन संसद के भीतर मेजों की गड़गड़ाहट और बाहर आम आदमी की खामोशी के बीच का अंतर इस बार भी कम होता नहीं दिख रहा।

संसद के भीतर जब वित्त मंत्री बजट भाषण की एक-एक पंक्ति पढ़ती हैं, तो सत्ता पक्ष के सांसद उसे ऐतिहासिक बताते हुए मेजें थपथपाते हैं। लेकिन विडंबना यह है कि जब वह भाषण समाप्त होता है और संसद की चौखट से बाहर आता है, तो जनता के हाथ में केवल 'बजट की प्रतियां' ही होती हैं।अधिकारों और राहत का वह वास्तविक हिस्सा गायब रहता है, जिसकी उसे दरकार थी। इस बजट को यदि बारीकी से देखा जाए, तो समाज के उन स्तंभों के लिए निराशा अधिक दिखती है, जो देश की अर्थव्यवस्था की नींव रखते हैं। कहा कि 'रोजगार' शब्द बजट भाषणों में एक रस्म की तरह इस्तेमाल होता है, लेकिन ठोस रोडमैप की कमी युवाओं के लिए इसे महज एक 'झुनझुना' साबित करती है।

डिग्रियों के बोझ तले दबे युवाओं को आंकड़ों के खेल से ज्यादा नौकरियों के अवसरों की तलाश है। वहीं, एमएसपी की कानूनी गारंटी और लागत के दोगुने दाम की मांग आज भी फाइलों के नीचे दबी है। खेती की बढ़ती लागत और अनिश्चित मौसम के बीच किसान को मिली मामूली राहत 'ऊंट के मुंह में जीरा' जैसी है। कमरतोड़ महंगाई के दौर में मध्यम और मजदूर वर्ग को उम्मीद थी कि टैक्स स्लैब या सब्सिडी के जरिए कुछ सीधी राहत मिलेगी, लेकिन बजट का ढांचा उन्हें फिर से बाजार के रहमों-करम पर छोड़ दिया।

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पूर्व नेता प्रतिपक्ष उत्तर प्रदेश श्री चौधरी ने कहा कि बजट केवल आय और व्यय का लेखा-जोखा नहीं, बल्कि यह देश के अंतिम व्यक्ति की मुस्कान का दस्तावेज होना चाहिए। जब तक बजट के आंकड़े आम आदमी की रसोई और नौजवान के रोजगार कार्ड तक नहीं पहुंचते, तब तक इसे 'ऐतिहासिक' कहना केवल एक राजनीतिक मुहावरा ही रहेगा। जनता को भाषण नहीं, राशन और शासन में अपनी हिस्सेदारी चाहिए।

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