8th Pay Commission : फिटमेंट फैक्टर पर बलिया के शिक्षक ने लिख डाली पूरी हिस्ट्री, जानें ताजा अपडेट



जिस हिसाब से सोशल मीडिया पर आठवां वेतन आयोग (8th Pay Commission) की खबरें तैर रही हैं, उस हिसाब से हर घर में एक अम्बानी होना चाहिए। सब के छत पर हेलिपैड और सबका पर्सनल चार्टेड प्लेन होना चाहिए। फिटमेंट फैक्टर की तो जैसे बोली लग रही है।
1.8
1.8 one
1.8 two
तब तक अगली बोली लग जाती है
1.92
फिर उसके बाद
2.1
फिर 2.25 और इसी तरह आगे बढ़ते हुए क्रमशः 2.57, 2.38, 3.0 और अंत में 3.25 पर आकर रुकी हुई है। अभी एक साल से ज्यादा समय लगेगा रिपोर्ट आने में, तब तक कहीं फिटमेंट फैक्टर 10, 20 और 30 तक न पहुंच जाए। इन्क्रीमेंट तो ऐसे बंट रहे हैं जैसे खेतों में इंक्रीमेंट के फसल की बम्पर पैदावार हुई है और फसल गोदाम में पड़े-पड़े सड़ रहे हैं। नहीं दिया जाएगा तो बर्बाद हो जाएंगे।इसीलिए दे के ख़त्म करो और बच जाए तो बेरोजगारों को, छात्रों को और गृहणियों को भी बांट दो।
जिस हिसाब से वेतन आयोग की रिपोर्टिंग है, उस हिसाब से हर कर्मचारी को केवल बैंक में खाता खोलने से काम नहीं चलेगा, उसे अपना बैंक खोलना पड़ेगा। और पैसा तो इतना होगा कि दुनिया के सबसे बड़े आर्थिक संस्थान कर्मचारियों से लोन मांगेंगे। इसी दिवास्वप्न के बीच एक कॉल आती है, 'ये कॉल SBI से है,आपके होम लोन की emi 10 तारीख को काटी जाएगी।कृपया आवश्यक धनराशि खाते में मेन्टेन रखें।' तब लगा कि किसी ने एकदम से वज्राघात कर दिया है। मन कल्पना के दिव्यलोक से धरातल पर आ गया।
फिर दिमाग पुराने वेतन आयोगों पर जाता है। हर वेतन आयोग में इसी तरह टाटा-बिरला-अम्बानी-अडानी बनाने के सपने दिखाए गए थे। हर वेतन आयोग के पहले मीडिया ने कर्मचारियों की बल्ले बल्ले और छप्पर फाड़ वेतन जैसे विशिष्ट अलंकारों से कर्मचारी को सपनों के झाड़ पर चढ़ाया था। वेतन आयोग लगने के पहले महंगाई सुरसा की तरह मुंह बाए खड़ी मिली, जिसने वेतन में हुई बढ़ोतरी को लील लिया और जो कुछ बचा वो भोगवाद के वैभव का ग्रास बन गया।
हर वेतन आयोग ने कर्मचारी को कुबेर बनने के सपने दिखाए, लेकिन उसका संघर्ष अनवरत जारी रहा। सात वेतन आयोग आने के बाद भी कर्मचारी घर बनाने के लिए लोन लेता है। गाड़ी खरीदने के लिए लोन लेता है। इलाज के लिए लोन लेता है। बच्चों की पढ़ाई के लिए लोन लेता है। बेटी की शादी के लिए लोन लेता है। जब तक जीता है, तब तक लोन लेता है और मर जाने के बाद अपनी संतान को विरासत में लोन दे जाता है। यदि वो लोन चुका कर मरता है तो लोन लेने की परंपरा को सांस्कृतिक विरासत के रूप में दे देता है। वो भी लोन लेता है और आर्थिक गुलामी की अंतहीन परम्परा जारी रहती है।
ये वेतन आयोग ट्रैप की तरह लगते है
मेडिकल की भाषा में में स्टेरॉयड की तरह जो एक क्षण के लिए आपकी कार्यशक्ति में बहुत तेजी से इजाफा कर देते हैं, लेकिन शरीर उसका आदि हो जाता है। वेतन आयोग शुरू में कुछ राहत देते हैं, लेकिन अंत में जीवन को थकाऊ बना देते हैं। हर वो वस्तु या सेवा जो आज शौक है, कुछ दिन बाद आदत बन जाती है। उसके बाद जरूरत और अंत में मजबूरी। जिसे हम लक्सरी कहते हैं वो वास्तव में नशा है। मुझसे कोई पूछे कि वेतन आयोग में क्या होना चाहिए तो मैं कहूंगा कि वेतन आयोग में बेहतर स्वास्थ्य, बेहतर शिक्षा, अच्छा भोजन और अच्छे वातावरण पर चर्चा होनी चाहिए।
व्यक्तिगत रूप से वेतन को 18 हजार से 50 हजार बढ़ा देने से ज्यादा अच्छा है कि दो लाख करोड़ रुपये को जनहित में लगा दिया जाये। लेकिन, जिन्हें इसे जगह पर निवेश करना होगा वे इसे गरीब कल्याण कह कर वोट बैंक के लिए रेवड़ी की तरह बांट कर अपनी कुर्सी को स्थाई करेंगे। इसीलिए जो चल रहा है वो चलता रहेगा। ये अंतहीन दौड़ जारी रहेगी। हर वेतन आयोग में आदमी को टाटा-बिरला-अडानी-अम्बानी बनाया जाएगा। हो सकता है अगले वेतन आयोग तक एलोन मस्क, बिल गेट्स और जेफ बेसोज के अपने भी फ़िज़ाओं में तैरने लगे।
आशुतोष ओझा
सहायक अध्यापक, बलिया

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