फूल हूं... तासीर मेरी तितलियों से पूछना
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ग़ज़ल
कब कहा मैंने किसी क़तरे से कुछ ज़्यादा हूँ मैं
हाँ, मगर सूखे हुए दरिया से तो अच्छा हूँ मैं
शहर में आया हुआ हूँ ... गाँव का बन्दा हूँ मैं
या कहूँ कि भीड़ में बिछडा हुआ बच्चा हूँ मैं
ख़ुश न हो इतना मुझे तू देखकर फुटपाथ पे
सेठ ! तेरे मालो-ज़र से आज भी महँगा हूँ मैं
है तज़र्बा रोज़ जीने और मरने का मुझे
रोज़ सूरज की तरह जलता हूँ मैं बुझता हूँ मैं
तू इसे मेरी अना समझे कि पागलपन कहे
दुश्मनी भी हैसियत वालों से ही करता हूँ मैं
फूल हूँ... तासीर मेरी तितलियों से पूछना
देवता को क्या पता खट्टा हूँ या मीठा हूँ मैं
हर किसी से इश्क़ करने का नतीज़ा ये हुआ
साथ अब कोई नहीं है... बे-तरह तन्हा हूँ मैं
• क़तरा = बूँद
• अना = स्वाभिमान
• माल-ओ-ज़र = धन-दौलत
कॉपीराइट --- शशि प्रेमदेव, बलिया

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