Vat Savitri Vrat 2024: वट सावित्री व्रत 6 जून को, बलिया के पंडित आदित्य पराशर से यहां जाने पूजा का सही नियम

Vat Savitri Vrat 2024: वट सावित्री व्रत 6 जून को, बलिया के पंडित आदित्य पराशर से यहां जाने पूजा का सही नियम

Vat Savitri Vrat 2024 : वट सावित्री का व्रत हर सुहागिन के लिए बहुत खास माना गया है। मान्यता है कि इस व्रत के फल स्वरूप पति को दीर्घायु  का वरदान मिलता है। कहते हैं कि ये सौभाग्यदायक व्रत इतना शक्तिशाली है कि एक समय यमराज भी अपना निर्णय बदलने को मजबूर हो गए थे। सावित्री के पति सत्यवान को पुन: जीवित कर दिया था।

बलिया शहर से सटे अमृतपाली निवासी ज्योतिर्विद आचार्य पंडित आदित्य पराशर बताते हैं कि सुहागिन महिलाओं के लिए वट सावित्री का व्रत विशेष महत्व रखता है। पति की लंबी आयु के लिए विवाहित महिलाएं इस दिन निर्जला उपवास रखती हैं। वट सावित्री के दिन वट यानी बरगद के पेड़ की पूजा की जाती है। साथ ही माता सावित्री की कथा सुनी जाती है। धार्मिक मान्यताओं के मुताबिक, वट सावित्री का व्रत रखने से पति के ऊपर मंडरा रही हर संकट टल जाती है और दांपत्य जीवन भी सुखमय, खुशहाल बना रहता है।

पंडित आदित्य ने बताया कि हर वर्ष ज्येष्ठ मास की अमावस्या तिथि के दिन वट सावित्री व्रत किया जाता है। *इस वर्ष पति की दीर्घायु के लिए सुहागिन महिलाएं 6 जून 2024 दिन गुरुवार को वट सावित्री का व्रत रखेंगी।* इस व्रत में वट वृक्ष की परिक्रमा की जाती है और उसमें 7 बार कच्चा सूत बांधा जाता है। तो आइए जानते हैं कि इसका क्या धार्मिक महत्व है।

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वट सावित्री के दिन बरगद पेड़ में कच्चा सूत क्यों बांधा जाता है?
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, वट सावित्री व्रत के दिन बरगद पेड़ की विधिपूर्वक पूजा करने से अखंड सौभाग्य का आशीर्वाद मिलता है। सुहागिन महिलाएं वट सावित्री के दिन बरगद पेड़ की पूजा के साथ उसकी सात बार परिक्रमा करती हैं। इसके अलावा व्रती महिलाएं बरगद के पेड़ में सात बार कच्चा सूत भी लपेटती हैं। पंडित पराशर कहते हैं कि वट वृक्ष में सात बार कच्चा सूत लपेटने से पति-पत्नी का संबंध सात जन्मों तक बना रहता है। मान्यताओं के मुताबिक, बरगद के पेड़ पर कलावा बांधने से अकाल मृत्यु जैसे योग टल जाते हैं और पति को दीर्घायु का वरदान मिलता है।

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पौराणिक कथाओं के अनुसार,  यमराज ने माता सावित्री के पति सत्यवान के प्राणों को वट वृक्ष के नीचे ही लौटाया था और उन्हें 100 पुत्रों का वरदान दिया था। कहा जाता है कि उसके बाद से ही वट सावित्री व्रत और वट वृक्ष की पूजा की परंपरा शुरू हुई। मान्यता है कि वट सावित्री व्रत के दिन दिन बरगद पेड़ की पूजा करने से यमराज देवता के साथ त्रिदेवों की भी कृपा प्राप्त होती है।

ज्योतिष शास्त्र के अनुसार इस व्रत को सौभाग्यवती स्त्रियां अपने पति की लंबी आयु और सुख-समृद्धि की कामना के लिए रखती हैं। वहीं कुंवारी लड़कियां सुयोग्य वर की प्राप्ति के लिए इस व्रत को करती हैं. कहा जाता है कि जो सुहागिन महिलाएं इस व्रत को विधि-विधान से और सच्चे मन से रखती है. उन्हें अखंड सौभाग्यवती होने का वरदान मिलता है।

किस प्रकार से करें पूजन
इस दिन सूर्योदय से पहले उठकर सभी कार्यों से निवृत्त होकर स्नान कर लें। इसके बाद साफ सुथरे वस्त्र धारण कर लें। कोशिश करें कि लाल, पीले रंग के कपड़े पहनने के साथ सोलह श्रृंगार करें। 
इस दिन पीला सिन्दूर विशेष रूप से लगाना चाहिए।
सफेद, नीला या फिर काला रंग के वस्त्र न पहनें।
सभी सामान को थाली में लगाकर बरगद की पेड़ की पूजा करें। थोड़े से भिगोए हुए चने भी रख लें।
सबसे पहले बरगद के नीचे गाय के गोबर से लीप दें। अगर गोबर नहीं है, तो सावित्री और माता पार्वती की प्रतीक के रूप में दो सुपारी में कलावा लपेट कर रख लें।
हल्दी व आटा को जल में मिलाकर हथेलियों में लगाकर सात बार बरगद में छापा लगाएं।
वट वृक्ष में सबसे पहले जल चढाएं। इसके बाद फूल, माला, रोली,सिंदूर, अक्षत, अगरबत्ती, घी का दीपक, मिठाई,फल,दक्षिणा चढ़ा कर पूजन करें।
सुपारी के पास सोलह श्रृंगार आदि चढ़ा दें।
इसके साथ ही बांस का पंखा रख दें। 
फिर अपने मन में सुख-समृद्धि, सौभाग्य और खुशहाली की कामना करते हुए सफेद सूत का धागा या फिर सफेद नार्मल धागा, कलावा ले लें।

इसके बाद इसे वृक्ष के चारों ओर परिक्रमा करते हुए बांध दें। परिक्रमा 7–11 या फिर अपनी श्रद्धा के अनुसार कर लें। इसके बाद बचा हुआ धागा वृक्ष पर ही छोड़ दें।
अपने हाथों में भिगोए हुए चना ले लें और वट सावित्री व्रत कथा पढ़ या सुन लें।
कथा समाप्त होने के बाद चने को वृक्ष में चढ़ा दें।
फिर सुहागिन महिलाएं माता पार्वती और सावित्री को चढ़ाए गए सिंदूर को पांच बार लेकर अपनी मांग में लगा लें। अंत में आरती करके भूल चूक के
लिए प्रार्थना कर के क्षमा याचना कर लें।

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