सोच ! समन्दर, स्वस्थ भूमि हो...

सोच ! समन्दर, स्वस्थ भूमि हो...

प्रतिबद्ध
मोहित कर लेती वसुधा
नीले अम्बर की साड़ी ओढ़े
सोम प्रकाश दृष्टिगोचर लगता
आंचल में भर ली जलनिधि।
         परिवर्तन में पारी का होना
         प्राकृति का खेल अजूबा होना
         सुख-सुविधा के आतुर लोगों ने
         गम्भीर चुनौती उत्पन्न कर दी।
स्वस्थ रहे पारिस्थितिक तंत्र
यह अभिलाषा सबकी होती
स्वस्थ तन हो, स्वस्थ मन हो
सोच!समन्दर, स्वस्थ भूमि हो।
             जैवविविधता हो संरक्षित
              युक्ति सुन्दर होनी चाहिए
              छोड़ निचोड़ना हरि भूम को
              जैविक खेती होनी चाहिए।
चूम लिया गगन को हमने
छू लिया, जिसने दुधिया की रात
उज्वल रखें, समय की थाती
हरित गृह सघन बन वास।
           पनाह हमें धरती ने दी है
           जल धारण धरणी ने की है
           प्राणवायु की होती जरूरत
           जड़ से "चेतना" वनस्पति की है।
  🥦🥦🥦🥦🥦🥦🥦🥦🥦
             ---------R.kant(A.T.)
विश्व पर्यावरण दिवस को सुपुर्द🙏

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