अवध बिहारी सिंह की यह रचना सुनकर भावुक हो गये थे युवा तुर्क चंद्रशेखर




नन्हें से पिछड़े गांव का
बालक वह नंगे पांव का
अण्डर वीयर पहने हुये
गंजी में कुछ सहसे हुये
गमछे में दाना खा रहा
स्कूल में वह जा रहा
पर गुरुकुलों-सी सीख थी
अतिशय पुरानी लीक थी
चलकर उसी पर था पढ़ा
कुछ ठोंककर गुरु ने गढ़ा
किसलय सदृश वह स्निग्ध था
शिशुओं में सबसे वृद्ध था
प्रतिभा को ठिठकाया वहीं
अपने को भटकाया नहीं
फिर कांध पर झोला लिये
शिशु दूर ग्यारह मील चले
यह रोज का अभ्यास था
गुरुकुल न कोई पास था
कितनी कठिन थी साधना
जिज्ञासु की आराधना
घर पर अभावों की घटा
ममता की केवल थी छटा
घर छोड़ भाई भागते
रंगून जाकर थामते
करती प्रतीक्षा फीस थी
तनख्वाह तो दस-बीस थी
उससे पढ़ाये ये गये
कैसे बढ़ाये ये गये
धरती भी बंधक पड़ गयी
आंखें शरम से गड़ गयीं
तब उच्च शिक्षा मिल सकी
गुरु श्रेष्ठ दीक्षा मिल सकी
प्रतिभा मशक्कत में पले
तूफान में भी लौ जले
प्रतिभा को यदि रहबर मिले
क्षमता को यदि अवसर मिले
वह काल-रथ को हांकता
नभ, तल, अतल को नापता
आचार्य के गुरुमंत्र को
फिर आत्मबल के यंत्र को
वह साधता ही रह गया
अनुकूल अपने नाम के
वह गरल तक को सह गया
कुछ राजनीतिक मोड़ हैं
ये मोड़ सारे रोड़ हैं
घर से निकाले ये गये
कारा में डाले ये गये
यह डायरी उसकी कथा
यह राष्ट्र की जीवन-व्यथा
ये चन्द्रशेखर के जीवन की कथा
लेखक : अवध बिहारी सिंह
सौजन्य से : प्रोफेसर कृपा शंकर चौबे

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