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नवरात्र: नौ दुर्गा, यानि दिव्य नौ औषधियां

बलिया। पृथ्वी द्वारा सूर्य की परिक्रमा के काल में एक साल की चार संधियां है। मार्च व सितम्बर में पड़ने वाली गोल संधियों में दो मुख्य नवरात्र पड़ते है। इस समय रोगाणु आक्रमण की सर्वाधिक संभावना के कारण शरीर रोगग्रस्त होता है। इस दौरान स्वस्थ्य रहने, शरीर को शुद्ध रखने तथा तन-मन को निर्मल रखने के लिए की जाने वाली प्रक्रिया का नाम ही नवरात्र है। नवदुर्गा का ये नौ रूप औषधियों के रूप में कार्य करता है। इसीलिए इस नवरात्र को सेहत नवरात्र के रूप में भी जाना जाता है।

मारकण्डेय चिकित्सा पद्धति में इस प्रणाली के रहस्य को ब्रह्मा जी ने दुर्गा कवच कहा है, जो प्राणियों के पांचों ज्ञानेन्द्रियों व पांचों कर्मेन्द्रियों पर प्रभावशील होकर मनुष्य को अकाल मृत्यु से बचाता है। प्रथम रूप शैलपुत्री, जिन्हे हेमावती ‘हरण’ कहा जाता है। शैलपुत्री की सात औषधियां हरितिका, पथया, कायस्थ, अमृता, हेमवती, चेतकी, श्रेयशी है। दूसरा रूप ब्रह्मचारिणी, जिन्हें ब्राह्मी कहा गया है। यह आयु व स्मरण को बढ़ाने तथा रूधिर विकारों का नाश करने के साथ-साथ स्वर को मधुर बनाती है। तीसरे रूप में विद्यमान मां चन्द्रघंटा, जिन्हें औषधीय रूप में चन्दूसूर या चमसूर कहा जाता है। यह एक ऐसा पौधा है, जो धनिया के समान होता है। इससे मोटापा दूर होता है।

यह शक्ति को बढ़ाने वाली और हृदय रोग को ठीक करने वाली औषधी है। भगवती का चौथा रूप कुष्माण्डा है। इन्हें कुम्हड़ा कहते है, जो पुष्टिकारक होता है। रक्त विकार दूर करने की क्षमता के साथ-साथ मानसिक रूप से कमजोर व्यक्ति के लिए अमृत के समान है। मां दुर्गा का पांचवां रूप स्कन्दमाता है, जिन्हें औषधीय रूप में अलसी कहा गया है। यह वात व कफ आदि रोगों का नाशक है। छठवें रूप में विद्यमान मां कात्यायनी मोईयां के नाम से औषधीय रूप में विख्यात है। यह विभिन्न रोगों को मिटाने के साथ कण्ठ के रोगों का शमन करता है। सातवें रूप में मां कालरात्रि नागदौना औषधी के रूप में जानी जाती है। सभी प्रकार के रोगों के नाशक सर्वत्र विजय दिलाने वाली मन व मस्तिष्क के समस्त विकारों को दूर करने वाली यह औषधी है। यदि इसे घर में लगा दिया जाय तो घर के सभी कष्ट स्वमेव नष्ट हो जाते है।

दुर्गा का अष्टम रूप महागौरी है, जिनका औषधीय नाम तुलसी है। सफेद, काली, मरूता, दवना, कुढ़ेरक, अर्जक व षट्पत्र सात रूपों में विद्यमान यह औषधी हृदय रोगों के लिए रामबाण है। नवें रूप में सिद्धिदात्री माता शतावरी औषधी के रूप में जानी जाती है। बल, बुद्धि व तेज को बढ़ाने के साथ ही रक्त विकार, रक्त पित्तनाशक व हृदय को बल देने वाली इस महाऔषधी का नित्य सेवन करने से सभी कष्ट दूर हो जाते है।

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