मैं आहत हूं, मेरा कोई नहीं सुन रहा, मेरी अर्जी पर विचार हो : मैं बलिया हूं

मैं आहत हूं, मेरा कोई नहीं सुन रहा, मेरी अर्जी पर विचार हो : मैं बलिया हूं


मैं बलिया हूं। मेरे साथ ऐसा क्यों हो रहा है। आजादी की लड़ाई में मेरे क्रांतिकारी वीर सपूतों ने प्राणों की आहुति दी। भृगु ऋषि के नाम यानी भृगु बाबा की जयकारा से मेरा नाम गूंजता है। ददरी मेला की वजह से भी मुझे लोग पहचानते हैं। मेरी अर्जी पर विचार हो। विनम्र विनती है। मैं आहत हूं। मेरा कोई नहीं सुन रहा, क्या यही दिन देखना था मुझे ? मेरी धरती के युवाओं में आक्रोश की ज्वाला धधक रही है, फिर भी महोदय, माननीय और हाकिम... आप चुप क्यों हैं ? कुछ तो बताया जाय। सब कुछ के बावजूद मैंने हरेक सरकार में माननीयों को भेजा, क्या यही हश्र होना था। मेरे धरती के हर इंसान परेशान हैं, ऐसी क्या स्थिति आई है। राजनीतिक पार्टियों से मेरा कोई शिकायत नहीं है। अगर शिकायत है तो उन सरकारों से, जो हमेशा सत्ता में आकर मेरी धरती से धोखा किया। 


बलिया मेरा नाम पड़ा। मुझे लोग बागी बलिया के नाम से जानते है। मुझे ददरी मेला वाला बलिया कहा जाता है। मुझे गर्व रहता है, क्योंकि मेरे सपूतों ने देश की आजादी के लिए क्या कुछ नहीं किया। ददरी मेला न सिर्फ इतिहास, बल्कि हमारी परम्परा, सभ्यता और संस्कृति से ताल्लुकात रखता है। 


कोरोना संक्रमण को लेकर ददरी मेला न लगाने वाले प्रशासनिक निर्णय से हम आहत है। यहां का जर्रा-जर्रा चाहता है कि मेला लगे, इसके लिए विरोध प्रदर्शन शुरू है। हस्ताक्षर अभियान, पुतला दहन और अनशन तक हो रहा है। 


मैं इस बात के लिए भी दुखी हूं कि एक बार जिला प्रशासन द्वारा मेरे शहर के स्टेशन चौक रोड सहित पूरे जनपद के बाजार व्यवस्था को देखकर निर्णय लिया होता। सड़क हो या बाजार भीड़ ही भीड़ है। क्या ददरी मेला में बाजारों के अपेक्षाकृत ज्यादा भीड़ जुटती ? कार्तिक पूर्णिमा स्नान तो होगा, लेकिन मेला नहीं लगेगा। क्यों महोदय ? यह मेरा दर्द शायद कोई नहीं सुनने वाला है। किससे और कैसे कहूं? मेरा आग्रह स्वीकार करे महोदय।

नरेन्द्र मिश्र, वरिष्ठ पत्रकार बलिया

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