मोबाइल और बचपन : बलिया के शिक्षक की स्वरचित यह बाल कविता मचा रही धमाल
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स्वरचित बाल कविता-11
मोबाइल और बचपन
(1)
मोबाइल चमके नयी चमक से,
लुभाए मन को मधुर झलक से।
कभी कहानी, कभी खिलौना,
सपनों जैसा लगे सलोना।
(2)
पर दिनभर जब इसे निहारें,
आँखें थकें, सपने उधारें।
चश्मा लगना हो गया आम,
बचपन का क्यों हो निष्काम?
(3)
खेल-खिलौने सब छूट गए,
बाग़-बगीचे भी रूठ गए।
दोस्तों संग न रही मुलाक़ात,
मोबाइल ने दे दी मात।
(4)
माँ-बाबा भी व्यस्त बहुत है,
उनसे मिलता न बच्चों को सुख है।
फोन थमाकर चुप कराते,
प्यार-दुलार कम कर जाते।
(5)
तन में थकान, मन में उदासी,
धीरे-धीरे घटती है हँसी।
बीमारियाँ बढ़ती जाएँ,
बचपन की खुशियाँ मिट जाएँ।
(6)
आओ मिलकर नियम बनाएँ,
मोबाइल कम ही उपयोग में लाएँ।
खेल-कूद को समय दें प्यारा,
बनाएँ जीवन स्वस्थ-सुनहरा।
(7)
बच्चों संग माता-पिता भी खेलें,
हँसते-गाते पल के मेले।
मोबाइल साथी है बस मानो,
उसका दास न खुद को जानो।
नन्द लाल शर्मा ✍️
सीयर, बलिया
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31 Aug 2025 22:48:53
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