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सावधान! आने वाला है घातक कुहरा: डा. गणेश पाठक

हम सभी प्रति वर्ष देखते हैं कि जाड़ा प्रारम्भ होते ही कुहरा गिरने लगता है और जाड़ा समाप्ति के साथ ही कुहरा गिरना बंद हो जाता है। प्रश्न यह उठता है कि कुहरा जाड़े में ही क्यों गिरता है और कुहरा की उत्पत्ति कैसे होती है?
धरातल के निकट आर्द्रता पूर्ण वायु की परतों में जब शीतलन के फलस्वरूप संघनन की प्रक्रिया होने लगती है , तो वायु में जल के अत्यन्त सूक्ष्म कण बन जाते हैं। वायुमंडल में इन्हीं जल कणों अथवा हिम के असंख्य सूक्ष्म कणों की उपस्थिति के फलस्वरूप जब उसकी पारदर्शिता एक किलोमीटर से कम हो जाती है अन्तर्राष्ट्रीय मौसम वैज्ञानिक मापदण्ड के अनुसार उसे “कुहरा” या “कोहरा” कहा जाता है।

कुहरे की उत्पत्ति के लिए विशेष परिस्थितियों का होना आवश्यक है। धरातल के निकट की अत्यधिक आर्द्र( नम) वायु में रात के शीतलन के कारण जब संघनन की क्रिया शुरू हो जाती है तो कुहरे की उत्पत्ति होती है। वैसे कुहरे की उत्पत्ति के लिए वायु का तापमान ओसांक से नीचे हो जाना आवश्यक होता है। वायु के तापमान में यह कमी अनेक कारणों से हो सकती है। जैसे नम वायु ठंडे धरातल के सम्पर्क में आने अथवा प्रसरण के कारण शीतल हो सकती है एवं उसका तापमान ओसांक तक कम हो सकता है। वायुराशि वाष्पीकरण द्वारा जल वाष्प की आपूर्ति से भी कभी-कभी संतृप्त हो जाती है। क्योंकि समुद्र, नदी, झील आदि की सतह से सदैव वाष्पीकरण होता रहता है, जिससे वायु जलवाष्प प्राप्त कर लेती है। धरातल पर पहुंचने से पहले ही पुनः वाष्पित हो जाने वाली ऊपरी वायुमण्ल से होने वाली वर्षा से भी कभी- कभी वायु को जलवाष्प प्राप्त हो जाता है।

उपर्युक्त सभी दशाओं में वायु का ओसांक अधिक हो जाता है। जब शीतकाल में महाद्वीपों की ऊपर की वायु में स्थायित्व उत्पन्न हो जाता है तथा जैसे- जैसे उसमें जलवाष्प की पर्याप्त मात्रा पहुंच जाती है, तब कुहरा बनना शुरू हो जाता है। चूंकि महासागरों पर उपर्युक्त दशाएं ग्रीष्म ऋतु में उत्पन्न होती हैं , इसलिए महासागरों पर कुहरे की उत्पत्ति ग्रीष्म काल में होती है।

सामान्यतः वायुमण्डल के पूर्णतया संतृप्त हो जाने पर ही कुहरे की उत्पत्ति होती है, किन्तु संघनन एवं जलग्राही नाभिकों की स्थिति में जब वायुमण्डल में प्रदूषण की मात्रा अधिक हो जाती है तो आपेक्षिक आर्द्रता जैसे ही 70 प्रतिशत से अधिक हो जाती है तो संघनन क्रिया शुरू हो जाती है, फलस्वरूप कुहरा या धुन्ध बन जाता है। आपेक्षिक आर्द्रता में कमी होने पर शुष्क धूल कणों एवं धुएं के कारण शुष्क धुन्ध की उत्पत्ति होती है, किन्तु जब आपेक्षित आर्द्रता बढ़ती है तो बड़े नाभिकों पर संघनन क्रिया शुरू हो जाती है।

वायु के तापमान में लगातार कमी होने एवं आपेक्षिक आर्द्रता के 90 प्रतिशत से अधिक हो जाने पर कुहरा या धूम कुहरा बन जाता है और इस प्रकार प्रदूषित वायुमंडल में 100 प्रतिशत आपेक्षिक आर्द्रता होने के पहले ही कुहरे की बनने की प्रक्रिया शुरू हो जाती है।
वर्तमान सयम में वायुमण्डल में विद्यमान विभिन्न प्रकार की विषैली गैसों एवं सूक्ष्म धूल कणों के कारण कुहरे की प्रकृति में भी बदलाव आ गया है और कुहरा अत्यधिक घना एवं विषैला होता जा रहा है। इन विषैली गैसों से युक्त कुहरे को”धूम कुहरा” कहा जाता है, जिसके प्रभाव से न केवल दृश्यता समाप्त हो जाती है, बल्कि इससे सांस लेने में भी दिक्कत होती है, दम फूलने लगता है, आ़खों में जलन होती है और दम घुटने से मौत तक हो जाती है।

खासतौर से औद्योगिक क्षेत्रों में इस तरह के धूम कुहरे अधिक उत्पन्न होते हैं। अनेक देशों में इस तरह के धूम कुहरे से हजारों लोगों की जाने जा चुकी हैं। अपने देश में पंजाब एवं हरियाणा में जलायी जाने वाली फसलों की पराली से दिल्ली सहित पूरे उत्तर भारत में कुहरा विषैला है जाता है और खतरनाक स्थिति उत्पन्न हो जाती है। बलिया जनपद भी इससे अछूता नहीं रहता है। कुहरे के कारण दृश्यता कम हो जाने या समाप्त हो जाने से रेल परिवहन, वायु परिवहन एवं सड़क परिवहन तीनों प्रभावित होता है, जिससे भयंकर दुर्घटनाएं होती हैं एवं धन- जन दोनों की अपार क्षति होती है।

कुहरे की उत्पत्ति धरातल से बहुत कम ऊंचाई पर होती है। कुहरे के समय धरातल के पास वायुमण्डल बारीक एवं घने जलकणों से आच्छादित हो जाता है। फलतः निकटवर्ती वस्तुओं की भी प्रारंभिक दृश्यता समाप्त हो जाती है। अर्थात पास की वस्तुएं भी दिखाई नहीं देती हैं। दृश्यता के आधार पर कुहरा को चार प्रकारों में बांटा गया है-

1. हल्का कुहरा( दृश्यता- 1100 मीटर तक)
2. साधारण कुहरा ( 1100 – 550 मीटर तक )
3. सघन कुहरा( 550 – 300 मीटर तक
4. अति सघन कुहरा ( 300 मीटर से कम)
इस प्रकार स्पष्ट है कि सघन एवं अति सघन कुहरा विशेष घातक होता है। ऐसे कुहरे में दृश्यता काफी कम हो जाती है। जाड़े के दिनों में अधिक दिनों तक कुहरे टिके रहने के कारण फसलों को विशेष क्षति पहुंचती है, जिससे किसानों को भारी आर्थिक क्षति उठानी पड़ती है।

सम्पूर्ण उत्तरी भारत कुहरे के भयंकर चपेट में रहता है ।आवागमन वाधित हो जाता है। रेल, वायु एवं सड़क परिवहन रूक जाता हैं , दुर्घटनाएं बढ़ जाती हैं एवं धन- जन दोनों की भयंकर क्षति होती है। अधिक दिनों तक घना कुहरा छाए रहने से सूर्य प्रकाश भी नहीं दिखाई देता है, जिससे तापमान में विशेष गिरावट आ जाती है और तापमान शून्य डिग्री से भी नीचे चला जाता है , जो प्रत्येक दृष्टि से घातक होता है और सम्पूर्ण जीवधारियों का जीवन अस्त – व्यस्त होकर संकट में पड़ जाता है।

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