देखें, वर्तमान परिवेश में कितनी सटिक है ये कहावतें

देखें, वर्तमान परिवेश में कितनी सटिक है ये कहावतें



बैरिया, बलिया। भले ही हम वर्तमान में हर घटना वैज्ञानिक दृष्टिकोण से देखते है, परंतु भारतीय चिंतन की सच्चाई को नकार नहीं सकते। महाभारत, गीता, रामायण आदि के हर पृष्ठ को पलटते हैं तो हमें पता चलती है कि सदियों पूर्व भारतीय मानसिकता, चिंतन, अनुभव कितना व्यापक था। हम मौसम के ऊपर ही गौर करें तो गांव की मिट्टी से बुजुर्ग या जनकवि जो रचनाएं पहले लिख चुके हैं, गांव का जीवन आज भी उसी के आधार पर चलता है।



जन कवि घाघ, नागार्जुन आदि की कहावतें हमारे स्वास्थ्य के प्रति आज भी जागरूक करते प्रतीत होते हैं। उन कवियों की देसी कहावतों का संग्रह रखने वाले क्षेत्र के लोग कहते हैं कि सावन हरे, भादो चीत, क्वार मास गुड़ खाए मीन अर्थात सावन महीने में हरे, भादो मास में चिरैता, अश्विन मास में गुड़ का सेवन स्वास्थ्य के लिए लाभदायक होता है। कार्तिक मूली, अगहन तेल पूष में करे दुध से मेल अर्थात कार्तिक महीने में मूली, अगहन में तेल तथा पौष माह में दुध का सेवन उत्तम है। माघ मास घीव खिचड़ी खाए, फागुन उठकै प्रात: नहाए अर्थात माघ मास में घी खिचड़ी का सेवन करना चाहिए एवं फागुन में सूर्योदय से पूर्व स्नान करना सेहत के लिए अच्छा होता है। चैत मास में नीम बेलहनी, वैसाखे खाय भात जरूरी अर्थात चैन मास में नीम जैसा तीता भोजन करना चाहिए एवं बैसाख महीने में भात खाना चाहिए।



इतना ही नहीं उन्होंने आम लोगों को इन कहावतों के माध्यम से सचेत भी किया है कि किस माह में क्या करें और क्या नहीं करे। जेठ मास जो दिन में सोए, ओकर जर असाढ़ में रोए  इसके अलावा उन जन कवियों के हर महीने किन-किन चीजों का सेवन स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होता है, उन पर भी व्यापक प्रकाश डाला है। सावन साग न भादो दही, क्वार करैला न कार्तिक मही अर्थात सावन माह में साग, भादो में दही, अश्विन माह में करैला व कार्तिक माह में मट्ठा का सेवन स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होता है। अगहन जीर, पुषे धना, माघे मिश्री, फागुन चना अर्थात अगहन महीने में जारी, पुष माह में धनिया, माघ महीने में मिश्री एवं फागुन में चना का सेवन स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हो सकता है।



इस तरह गांवों में आज भी ऐसे तमाम बुजुर्ग मिल जाते हैं जो कवि घाघ की कहावतों के माध्यम से मौसम का भी पूर्वानुमान लगा लेते हैं। उन्हें वैज्ञानिक बातें कम समझ में आती है। इस तरह गांवों की लगभग आधी आबादी जो कृषि से जुड़ी है, आज भी अपना जीवन उन जन कवियों के कहावतों के माध्यम से ही संचालित करती है।



शिवदयाल पांडेय 'मनन'

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