बलिया के डॉ. मनीष सिंह की कलम से 'दि कश्मीर फाइल्स'

बलिया के डॉ. मनीष सिंह की कलम से 'दि कश्मीर फाइल्स'

रात आठ बजकर तीस मिनट पर फिल्म The Kashmir Files शुरू हुई थी। दो घण्टे पचपन मिनट की फ़िल्म थी। सिनेमाघर जैसे वतन पर मरने वालों के युद्ध स्थल पर जोश का साजो सामान लिये इंतजार कर रहा था। पहली दफा सिनेमाघर में फिल्म के आततायी कलाकारों के लिये दिये जाने वाले भद्दे कमेन्ट कानों को कर्णप्रिय लग रहे थे। दिल कह रहा था कि मैं खुद अपने संस्कारों से आज विमुख होकर कुछ भद्दे कमेन्ट विलेन रूपी आतंकवादियों को तोहफे रूप में प्रस्तुत करूं। हां ये मेरे इलाहाबाद (प्रयागराज) के एक सिनेमाघर का वाक्या है। यह हिन्दी भाषी महानगर है और हर हिंदी सिनेमा में जबरदस्त भीड़ होती है तो इसमें भी थी। फ़िल्म समाप्त होने पर भारत माता की जय का उद्घोष आने वाले स्वतन्त्रता दिवस की झांकी को मनः मस्तिष्क पर उकेर रही थी। हम जीवित थे, तभी तो ये एहसास आ रहे थे।

मस्तिष्क सायं-सायं कर रहा है, यह हिंदी फिल्म विचलित किये हुए है, सोच रहा हूँ फिल्म की भयावहता। आंखों के सामने सारे दृश्य एक-एक कर नाच रहे हैं। यह फ़िल्म मनोरंजन मात्र नहीं, 1990 में कश्मीर में आतताइयों द्वारा किया गया कश्मीरी पंडितों के संहार का जीवंत दुहराव है। जैसे आंखों के आगे सब कुछ होता देख रहा हो इन्सान। क्रोध, घृणा से उबल रहा है, पर निरुपाय है। रीढ़ विहीन सरकार, बिकी और डरी हुई मीडिया, उस समय के तथाकथित कश्मीर के मुखिया और उनके जैसे तमाम आतताइयों के आगे यहां की सारी संस्थाएं घुटने टेक चुकी हैं जैसे। जेएनयू के देशद्रोही, फरेबी, वामपंथी प्रोफेसर गैंग किस तरह छात्रों के दिलों में भारत विद्रोही संस्कार को अपने तार्किक तरीकों से इंजेक्ट कर छात्रों को गुमराह ही नहीं, अपने एजेंडे के तहत उन्हें अपनी ही तरह गद्दार भी बना रहे हैं। यह कथा भी साथ साथ चलती है, बल्कि कहा जाए कि जेएनयू के परिवेश से ही कश्मीर की आज़ादी की मांग शुरू करने के बहाने कश्मीर की नरसंहार-गाथा का खुलासा भी होता जाता है। जिसके सच को ही वामियों ने दबा दिया था।

भले बाद में जाकर एक ब्रेनवाश कर दिये गए कश्मीरी पंडित (छात्र) द्वारा ही किस तरह हिन्दुओं के कश्मीर के पौराणिक-ऐतिहासिक सच को दिखाया गया है, वह इतिहास अद्भुत है, जानने योग्य है। कश्मीर से हिन्दुओं के नरसंहार और वहां से उनके भगाए जाने का प्रामाणिक दस्तावेज है यह फ़िल्म। भय पैदा करने के लिए लाइन में खड़ा कर दर्जनों स्त्री पुरुष बच्चों को गोली मार देने, एक जिन्दा औरत को लकड़ी चीरने की मशीन से चीर देने की घटनाएं विचलित कर देती हैं। कश्मीर के बारे में जब जानने का प्रयास किया तो राजा हरी सिंह का ही नाम आया। मैं पूछना चाहता हूं कि अरे नामुराद इतिहासकारों कश्मीर के इतिहास को छुपाकर क्या मिला तुम्हें? यह फ़िल्म देखकर आज ऐसा लगा कि वह तो कुछ नहीं, जितना सुना था। 5 लाख से ज्यादा कश्मीरी पंडित किस तरह पलायन को मजबूर हुए होंगे। 2 लाख कश्मीरी पंडितों का नरसंहार कश्मीरी पंडितों की दुर्दशा की ऐसी मार्मिक कहानी है यह फ़िल्म कि कोई भी मानव इसे देखकर, कश्मीर का सत्य जानकर क्रोध किये बिना न रह सकेगा। इस पर ये इतिहासकार दांत निपोरे यह लिख देते हैं की मात्र 1900 लोग ही कश्मीर में मरे थे। कितना आतंक है इन शब्दों में कि 'कन्वर्ट हो जाओ' या 'मर जाओ' या फिर 'भाग जाओ'। 

यह फ़िल्म 1990 के भयानक इतिहास की कथा इस तरह सिसकते हुए बताते चलती है कि मन बेचैन हो उठा है। फ़िल्म के कई दृश्यों में वहां के एक वरिष्ठ नागरिक जिनके परिवार को उनके शिष्य और पड़ोसियों ने निर्ममता पूर्वक मार डाला, पर वे अपने दुधमुंहे पौत्र को पालने के लिए जीवित रहते हैं, जो धारा 370 हटाने की बात बराबर उठाते दिखते हैं। अंत में उसी युवा पौत्र को अपनी अंतिम इच्छा (अपने अस्थियों को कश्मीर में अपने घर में बिखेरने की इच्छा) सुनाते प्राण त्याग देते हैं। यह वही युवा है, जिसे जेएनयू की एक प्रोफेसर ने ब्रेनवाश कर के कश्मीर का झूठ हजारों लड़के-लड़कियों के साथ उसे भी परोसती है और इस तरह का झूठ मानो वही सच हो। वामपंथी सोच का इतना घिनौना रूप सोचकर ही दिल बैठने लगता है। जब इस फिल्म का नायक ऋषि कश्यप के नाम पर बने कश्मीर, अदिगुरु शंकराचार्य, पाणिनि, अभिनवगुप्त, ललितादित्य आदि के माध्यम से इतिहास से साक्षात्कार कराता है तो लगता है कैसे कश्मीर के इतिहास को बुरी तरह आतंकियों, वामियों और इतिहास के दलालों ने बदल डाला है। यह फ़िल्म आंखों को खोलने का काम भी कर रही है। यह फ़िल्म की बहुत बड़ी उपलब्धि है। यह फ़िल्म सभी भारतीयों के मन से कश्मीर सम्बन्धी फैलाये गए बहुत सारे झूठ, भ्रम आदि का पर्दाफाश करती है। सच से आमना-सामना करवाती है। एक अपनेपन का रिश्ता जोड़ती है। भाव पैदा करना इस फ़िल्म का अतिरेक है। यह फ़िल्म सोचने पर विवश करती है कि देश के सभी हिन्दू, कश्मीरी हिन्दुओं की तरफ से इतने वर्षों तक तटस्थ और चुप कैसे रहे, और क्यों रहे? उस भाव को झकझोर देती है कि क्या हम जिन्दा हैं। वास्तव में यह फिल्म कश्मीर से अन्य जगहों पर जाकर बसे, असहनीय पीड़ा को सहने वाले कश्मीरी पंडितों की महागाथा है। काश ! की केंद्र सरकार शीघ्र ही उनके कश्मीर अपने घर वापस लौटने का सम्मानजनक और सुरक्षित प्रबन्ध कर सके तो हम भारतीय भी उनके शुक्रगुजार होंगे। 

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इसके निर्माता विवेक अग्निहोत्री, कलाकार अनुपम खेर, मिथुन चक्रवर्ती, पुनीत इस्सर, पल्लवी जोशी सहित इसके सभी कलाकारों ने अद्भुत और प्रशंसनीय काम किया है। नमन है विवेक जी के अदम्य साहस को, इस फ़िल्म को बनाने के लिए। सभी देशवासियों को यह फ़िल्म अवश्य देखनी चाहिए, खासकर मुसलमानों को भी, शायद उनके अन्दर भी उन आतंकियों के विरुद्ध मनुष्यता  का ज़मीर जगे, उनका नजरिया बदले। यह फ़िल्म एक साथ कई कई सन्देश देती है, जो भारत के लिए शुभ है। इसकी अपार सफलता की शुभकामनाएं। यह फ़िल्म हिन्दुओं के लिए आतंकियों की चेतावनी देती भविष्यवाणी भी है कि यदि इनसे बचना है तो कश्मीर की घटना से बड़ी कोई अन्य प्रेरणा नहीं हो सकती। यह फ़िल्म कई-कई स्तरों पर देश के सभी नागरिकों, विशेषकर हिन्दुओं के लिए चुनौती भरा सन्देश देती है, कि आज यदि हिन्दुओं का यह इतिहास साझा नहीं हुआ। चिंतन-मनन नहीं हुआ तो यह देश, इतना बड़ा समुदाय भविष्य में आतंकियों द्वारा अपनी दुर्गति का अभिशाप झेलने को तैयार रहें।

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सभी से निवेदन है कि फिल्म को सिनेमाघर में जाकर एक बार अवश्य देखें।

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डाॅ मनीष कुमार सिंह
प्रवक्ता (हिन्दी)
महाबीर सिंह इंटर कॉलेज, बादिलपुर हल्दी, बलिया, उत्तर प्रदेश 
मो०-9450604124

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