धीरे-धीरे समाजिक व्यवस्था को निगल रहा 'पापुलेशन' का दानव

धीरे-धीरे समाजिक व्यवस्था को निगल रहा 'पापुलेशन' का दानव


#विश्व जनसंख्या दिवस पर बोले खगोलविद

# बढ़ रही सामाजिक विकृति, हो रहा नैतिकता का पतन

बलिया।  वैसे तो जनसंख्या वृद्धि एक स्वाभाविक प्रक्रिया  है, लेकिन एक सीमा के बाद यह  संसाधन की बजाय समस्या बन  जाती है। नतीजतन उपलब्ध संसाधनों पर दबाल बढ़ने लगता है, जिससे अनेक तरह की सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक एवं राजनीतिक समस्याएँ उत्पन्न होने लगती हैं। इसके दुष्प्रभाव से भूभाग पर जनसंख्या का भार निरन्तर बढ़ता जाता है, फलस्वरूप लोगों का जीवन स्तर प्रभावित होने लगता है। आवासीय परिक्षेत्र एवं सम्पर्क के बढ़ने से कृषि भूमि निरन्तर कम होती जा रही है, जिससे कुल उत्पादन प्रभावित होने लगता है। उक्त बातें अमरनाथ मिश्र महाविद्यालय दुबे छपरा के पूर्व प्राचार्य एवं प्रख्यात खगोलविद डॉक्टर गणेश कुमार पाठक विश्व जनसंख्या दिवस के अवसर पर एक मुलाकात में कही।
उन्होंने कहा कि जनसंख्या वृद्धि ने मानव जीवन की गुणवत्ता को  काफी हद तक प्रभावित किया है, जिसमें भोजन, आवास, स्वास्थ्य, शिक्षा, पर्यावरण , लैंगिक असमानता की समस्या शामिल है। वहीं दूसरी तरफ जनसंख्या वृद्धि ने मानव जीवन में असंतुलन की स्थिति भी उत्पन्न किया है, जिससे मानव का सामाजिक एवं सांस्कृतिक परिवेश पूर्ण रूपेण प्रभावित हुआ है।


बताया कि जनसंख्या वृद्धि के सकारात्मक प्रभाव की अपेक्षा नकारात्मक प्रभाव विशेष घातक सिद्ध हो रहा है। जनसंख्या वृद्धि का मानव संसाधन के रूप में समायोजन एवं उपयोग न होने से समाज में अनेक तरह की बुराईयों का जन्म हो रहा है। यही कारण है कि आज बहुतायत लोगों के सामने आर्थिक, भोजन एवं आवास की कमी है तथा बेरोजगारी एवं निर्धनता में वृद्धि हो रही है।  यह जनसंख्या वृद्धि का ही दुष्प्रभाव है कि अपनी आर्थिक आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु मानव अनेक तरह के अनैतिक एवं गैरकानूनी कार्यों को करने के लिए मजबूर हो जाता है , जिससे समाज में अनेक बुराइयां जन्म ले रही है। 

  बलिया जिले में हो रहे जनसंख्या वृद्धि पर टिप्पणी करते हुए डॉक्टर पाठक ने कहा कि यदि बलिया के संदर्भ में जनसंख्या वृद्धि को देखा जाये तो बलिया जनपद में प्रारंभिक दो दशकों को छोड़कर निरन्तर जनसंख्या में वृद्धि हुई है। बलिया जनपद में वर्ष1901ई० में जनसंख्या 989420 थी, जो 1911 में घटकर 848371 हो गयी । इस तरह इस दशक की जनसंख्या में 141049 की कमी हुई, जो - 14.26 प्रतिशत रही। 1911 - 1921 के दशक में जनसंख्या 833510 थी।  जानकारी देते हुए बताया कि इस तरह इस दशक में 14861 की कमी आई जो - 1.75 प्रतिशत रही। इसके बाद जनपद की जनसंख्या में क्रमशः वृद्धि हुई है और 1921- 31, 1931- 41, 1941- 51, 1951- 61, 1961- 71, 1971- 81, 1981- 91, 1991- 2001 एवं 2001- 2011 के दशकों में जनसंख्या क्रमशः 915855, 1057485, 1190416, 1355863, 1588935, 1849708, 2262273, 2761620 एवं 3223642 रही। इस तरह इन दशकों में जनसंख्या में क्रमशः 82345, 141630, 133431, 144947, 253072, 260773, 412565, 499347 एवं 462022 की वृद्धि हुई जो क्रमशः 9.88, 15.96, 12.61, 12.17, 18.94, 16.41, 22.33, 22.10 एवं 16.77 प्रतिशत रही। उपरोक्त आंकड़ों से स्पष्ट है कि बलिया जनपद में भी जनसंख्या वृद्धि उत्तर- प्रदेश एवं अपने देश की वृद्धि के अनुरूप ही जनसंख्या वृद्धि होती रही।  परिणाम स्वरुप बलिया जनपद में  पारिवारिक विघटन की घटनाएं तेज हो गई।  इसके मूल में देखा जाए तो जनपद में कृषि ही अर्थव्यवस्था का मूल आधार है  और  निरन्तर हो रही जनसंख्या वृद्धि से कृषि योग्य भूमि का  दायरा सिमटता जा रहा है। जिससे यहाँ के रहवासियों के समक्ष आर्थिक विपन्नता की समस्या सुरसा की तरह मुंह बाए खड़ी हो गयी है।  जनसंख्या वृद्धि के कारण बेरोजगार युवक अपनी आवश्कताओं की पूर्ति हेतु अनैतिक कार्यों की तरफ अग्रसर हो रहे हैं, जिससे समाज में अनेक बुराइयां जन्म लेने लगी हैं। चोरी, छिनैती, डकैती जैसे आर्थिक अपराधों में वृद्धि हो रही है। लोग रोजगार के तलाव में नगरों की तरफ पलायन कर रहे हैं और नारकीय जीवन जीने कै मजबूर हो रहे हैं तथा अनेक दुष्चक्र में फँसते जा रहे हैं और अंततः आत्महत्या तक करने को भी मजबूर हो जा रहे हैं और उनका परिवार भी बर्बाद हो रहा है। 

 बलिया जनपद में  नगरीय जनसंख्या में भी अतिशय वृद्धि हुई है। जिसके चलते न केवल बलिया नगर में, बल्कि रसड़ा, बाँसडीह, रेवती, सिकन्दरपुर, बेल्थरारोड , मनियर , चितबड़ागांव एवं बैरिया जैसे छोटे नगरों में भी जनसंख्या वृद्धि का स्पष्ट प्रभाव न केवल आवासों की कमी, बल्कि विद्युत आपूर्ति की कमी, जल आपूर्ति की कमी एवं पर्यावरण प्रदूषण जैसी गम्भीर समस्याओं के साथ ही साथ सबसे अधिक ट्रैफिक जाम की समस्या से ग्रसित हैं, जिनका कोई समाधान होते नहीं दिखाई दे रहा है।
       

यदि जनसंख्या वृद्धि से उत्पन्न समस्याओं का समाधान ढ़ूढ़ना है तो सबसे पहले जनवृद्धि को मानव संसाधन के रूप में बदलना होगा। अन्यथा जनसंख्या वृद्धि का यह दानव दिन प्रति दिन हमें निगलता जायेगा एवं उससे निजात पाना नामुमकिन हो जायेगा।

By-Ajit Ojha

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