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गांधी बनाम गोडसे

गांधी और गोडसे
देश की आज़ादी के करीब 7 दशक बाद गांधी और गोडसे फिर से प्रासंगिक हो गए है। मुझे गांधी के बारे में बहुत नहीं पता। कुछ किताबों में पढ़ा था, और बहुत कुछ गोष्ठियों में सुना। गांधीवाद ने काफी तो नहीं, लेकिन कुछ हद तक प्रभावित किया है। फिलहाल जो मेरी कर्मस्थली है, मुजफ्फरपुर, गांधी से हद दर्जे तक प्रभावित भी है। गांधी के चंपारण सत्याग्रह का केंद्र उत्तर बिहार का चंपारण था, जिसकी शुरूआत मुजफ्फरपुर से हुई थी। मैंने वह जगह देखी है जहाँ गांधी ने रात गुजारी थी। जिस कुएं पर नहाए थे। और, किसानों को निलहे के आतंक से मुक्ति दिलाने के लिए पहली बैठक की थी।
दूसरी तरफ है नाथूराम गोडसे। इनके बारे में बहुत नहीं जानता। बचपन से ही बस गोडसे के बारे में सुनता रहा। गोडसे की किताब, मैंने गांधी को क्यों मारा, के बारे में भी सुना। बस कभी पढ़ नहीं पाया। पढ़ने की कभी इच्छा भी नहीं हुई।
आज गोडसे बहुतों के लिये पूजनीय है। गांधी की हत्या उनके लिए आज वाजिब लग रही है। मेरी समझ से यह मानसिक दिवालियापन से अधिक कुछ नहीं है। गोडसे ने जो किया वह भी, और आज उसके कृत्य का समर्थन भी।

जिन लोगों का खून देश के विभाजन पर खौल रहा है, जरा याद करें उनका परिवार 1947 के बाद कितनी बार खण्डित हुआ है। कई बार तो उनके सामने भी हुआ होगा। तो आप उसे नहीं रोक पाए, तो गांधी देश को नहीं बचा पाए, इस पर मत उलझिये। मान लीजिये, देश का बंटवारा नहीं हुआ होता, तो क्या होता। आज भारत की आबादी करीब 100 करोड़ से अधिक है। उसमें करीब 18 करोड़ मुस्लिम आबादी है। वहीं पाकिस्तान की करीब 20 करोड़ है। देश नहीं बंटता तो भारत 40 करोड़ मुस्लिम आबादी के साथ सबसे बड़ा मुस्लिम राष्ट्र भी होता।
गांधी गलत थे या सही, खुद खोजिये, जवाब मिल जाएगा।

‘गांधी और गोडसे’ पर छिड़ी बहसबाजी पर वरिष्ठ पत्रकार धनंजय पांडेय की त्वरित टिप्पणी

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