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गिले-शिकवे भूलकर खेलें प्रेम-स्नेह का रंग

होली का त्योहार आपसी भाईचारा का त्योहार है। यह त्योहार आपसी कटुता को भूलाकर प्रेम सद्भावना प्रकट करता है।पौराणिक मान्यताओं के अनुसार इस त्योहार को अधर्म पर धर्म की विजय के रुप में मनाया जाता है। सत्य की कसौटी पर परखने के बाद भक्त प्रह्लाद ने अपने पिता को भगवान मानने से इंकार कर दिया था।भले प्रहलाद को कठिन कष्ट झेलना पड़ा।यहां तक की उसकी बुआ होलिका उसे जलाकर मारने की नियत से आग में लेकर बैठ गयी, जबकि प्रह्लाद का बाल बांका नहीं हुआ। प्रह्लाद का अर्थ ही आनन्द होता है और आनंद अक्षुण होता है

होली को कृष्ण की रासलीला से भी जोड़कर देखा जाता है। होलिका के दिन ही भगवान कृष्ण ने पूतना का बध किया था और उसके अगले दिन ग्वाल और गोपियों ने रंग गुलाल खेला था। होलिका के दिन ही कामदेव का पुनर्जन्म भी माना जाता है। इसी दिन को पूर्ण चन्द्र की पूजा भी किया जाता है।

नये अधपके अन्न को आग में डालकर नवात्रैष्टि यग्य किया जाता है।अन्न को होला भी कहते हैं ।बैर व उत्पीड़न का प्रतीक होलिका है। होली एवं होलिका का वैज्ञानिक महत्व भी है। जाड़े का समापन एवं गर्मी के आगमन की वजह से शरीर अलसाने लगता है। होली गीत गाने से एवं जोर से जोगीरा गाने से शरीर में स्फूर्ति एवं उत्तेजना पैदा होती है।

होलिका दहन से 145 डिग्री फारेनहाइट तापमान बढ़ता है। रंग अबीर शरीर में लगाने से नई ऊर्जा का संचार होता है। रंग अबीर फेंककर ठहाके की हंसी और मनोरंजन के साधन स्वास्थ्य के लिए लाभदायक है। उस दिन सभी बैर भूलाकर लोग मित्रता बढ़ाने का प्रयास करते हैं जो एक सामाजिक ताने-बाने को जोड़ने का काम करता है।

प्रहलाद का मतलब ही आनंद होता है।अध्यात्म में भी तो ईश्वर की प्राप्ति परमानंद की प्राप्ति करना बताया गया है। बसंत पंचमी से लेकर होली तक भले परमानंद की प्राप्ति न हो, लेकिन करीब डेढ़ मास तक होली गीतों आनंद लोग अवश्य प्राप्त करते हैं।

इसके साथ कुछ बुराइयां भी है जैसे-
होली के त्यौहार के दिन कुछ लोग नशे का सेवन करके मारपीट गाली गलौज करते हैं एवं कुर्ता फाड़ होली खेल कर महौल खराब करते हैं। रंग के बदले कीचड़ फेंकते हैं, लेकिन इन बुराईयों से बचें और होली के इस पावन त्योहार को प्रेम व स्नेह से मनायें।

वीरेंद्र सिंह, मनियर बलिया।

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