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Dr Janardan Rai : प्यार की अनमोल दौलत की तरह लगता है तू…

बलिया। ‘प्यार की अनमोल दौलत की तरह लगता है तू, हर कदम पर शुभ मुहूर्त की तरह लगता है तू, और क्या इससे ज्यादा कहूं आपके लिए, दर्द की बस्ती में राहत की तरह लगता है तू’ यह पक्ति जैसे ही शशि प्रेमदेव ने पढ़ी, खुशियों की ताली से भृगु मंदिर का वाचनालय चहक उठा। मौका था, बलिया की माटी के लाल व पूर्वांचल के वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. जर्नादन राय के 80वां जन्मदिन का। साहित्य जगत की अमिट पहचान बन चुके डॉ. जर्नादन राय को जिले के साहित्यकारों, गीतकारों व आम से लेकर खाश लोगों ने अपने-अपने अंदाज में जन्मदिन की शुभकामनाएं देते हुए दीर्घायु की कामना की।

साहित्यकार डॉ. जनार्दन राय के जन्मदिन समारोह पर आयोजित संगोष्ठी को सम्बोधित करते हुए हिन्दी हितकारिणी सभा बलिया के अध्यक्ष व गंगा भक्त रमाशंकर तिवारी ने कहा कि हिंदी साहित्य के सशक्त, धारदार एवं निर्णायक इतिहास की पृष्ठभूमि के बिना अखण्ड राष्ट्र निर्माण की कड़ी मजबूत नहीं होगी। यह विचित्र विडम्बना है कि हिंदी को रोजी-रोटी की भाषा बनाये बिना राष्ट्र की अटूट डोर ताकतवर बनाने की केन्द्रीय कवायद हो रही है। डॉ. जनार्दन राय ने कहा कि हिंदी भाषा राष्ट्र में गतिमान विभिन्न भाषाओं, उनके चरित्र चिंतन तथा समुन्नत संस्कार की जननी है।

इसे राष्ट्रीयता का सीमांकन कर वर्तमान परिवेश में प्रासंगिक बनाना संभव है। इसके पूर्व भृगु मंदिर के शोध केन्द्र में आयोजित कार्यक्रम में उपस्थित लोगों ने डॉ. जनार्दन राय को माला पहनाकर उनके दीर्घायु की कामना की। जगन्नाथ तिवारी, अजीत मिश्र, डॉ. गणेश पाठक, डॉ. बनारसी राम, डॉ. मुहम्मद अली, डॉ. राणा प्रताप सिंह, श्रीराम तिवारी, फणिन्द्र राय, डॉ. अजय मिश्र, अजय पाल सिंह यादव, मदन यादव, बब्बन विद्यार्थी, जयप्रकाश पाण्डेय, डॉ. देवकुमार सिंह, जितेन्द्र राय, शंकर शरण, राजेन्द्र पाण्डेय, शिवानंद ओझा, शशिप्रेम देव, अवध बिहारी चौबे, गिरीश नारायण चतुर्वेदी, डॉ. रविन्द्र पाण्डेय, रविकांत पाण्डेय, सुदेश्वर अनाम, फतेहचन्द बेचैन, अजीत वर्मा, अमरदेव राय, हरिशंकर राय, विभव शंकर ठाकुर, संतोष राय, ब्रजकिशोर तिवारी, डॉ. शक्ति सिंह, आशीष त्रिवेदी, नवचन्द तिवारी आदि मौजूद रहे। संचालन परमात्मानंद पाण्डेय व डॉ. विवेकानंद सिंह ने संयुक्त रूप से किया। सभी का आभार चन्द्रभूषण पाण्डेय ने प्रकट किया।

कृतियों के झरोखे से डॉ. जर्नादन राय

गड़हांचल क्षेत्र के नरही गांव में 10 मार्च 1940 को जन्में डॉ. जनार्दन राय की कार्यशैली का हर कोई कायल है। हिन्दी, अंग्रेजी, संस्कृत, अर्थशास्त्र, दर्शन शास्त्र, समाज शास्त्र व शिक्षा शास्त्र में स्नातक, दो विषय से एमए के अलावा बीएड, पीएचडी तथा डीलिट् उपाधियों से अलंकृत डॉ. जर्नादन राय की अब तक लगभग डेढ़ दर्जन से अधिक पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी है।
लेखन कार्य को ही ओढ़ना और बिछौना बना चुके डॉ. राय के अतीत को देखें तो इनके जन्म के साथ ही मां अशर्फी देवी की मृत्यु हो गयी। पिता शिवनाथ राय व परिवार के अन्य लोगों के बीच पले-बढ़े डॉ. राय आदर्श इंटर कालेज नरही में शिक्षक के रूप में सेवा शुरू की। इसके बाद आपने नैनीजोर हाईस्कूल नैनीजोर व विश्वनाथ सिंह विद्यालय पिपराकलां मेें भी प्रधानाध्यापक के पद पर सेवा दी। आदर्श इंटर कालेज गोड़उर गाजीपुर से बतौर प्रवक्ता (समाज शास्त्र) वर्ष 2006 में सेवानिवृत्त हुए। हिन्दी साहित्य के इतिहास ग्रंथों का विकासात्मक एवं समीक्षात्मक अध्ययन पर पीएचडी की उपाधि प्राप्त डॉ. राय के साथ पूर्वांचल विश्वविद्यालय जौनपुर से डीलिट् की उपाधि प्राप्त करने वाले पहले छात्र का तमगा जुड़ा है। डॉ. राय के कृतित्व व व्यक्तित्व को लेकर ‘कृतियों के झरोखे से डॉ. जर्नादन राय’ नामक पुस्तक भी सम्मादित हो चुकी है। 80 बसंत देख चुके डॉ. राय विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में सम्पादन कार्य करने के साथ ही अपनी रचनाओं को मूर्त रूप देने में आज भी जुटे हुए है।

ये है रचनाएं

डॉ. जर्नादन राय की पहली पुस्तक परिवा है। इसके बाद गीत मेरे मीत मन के, लहरे आंचर बिहंसे गीत, आंचर के गीत, अपना परिवार, अपने लोग, कुहरे में डूब गया गांव, गांव क माटी, साहित्येतिहास: परम्परा और प्रवाह, आंचलिकता की अवधारणा और डॉ. विवेकी राय, राजनारायण, गांव की ओर, व्यक्ति और समाज, बिखर गये सपने हजार, लौटती है जिन्दगी, चिद्दी-चिद्दी पन्ने, मार्कसेन स्थेटिक्स, व्यक्ति और साहित्य-2 इत्यादि आपकी पुस्तकें समाज को दिशा दे रही है।
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