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कितना जल्दी पलट जाते हो तुम…

कितना जल्दी पलट जाते हो तुम, आज इस थाली कल उस थाली सरक जाते हो तुम!

बोलते हो जब तुम एक खेमे में जाकर अच्छे अच्छे के होश उड़ा जाते हो तुम!

कितना जल्दी पलट जाते हो तुम, आज इस थाली कल उस थाली सरक जाते हो तुम!

अभी कुछ दिन पहले मैने साथ देखा था जिस खुशनसीब के साथ!

आज उसकी बदनसीबी के नायक से खलनायक हो तुम!

कितना जल्दी पलट जाते हो तुम, आज इस थाली कल उस थाली सरक जाते हो तुम!

मैं जानता हूं तुम जन्म से शोषित पीड़ित और दुखी का राग जपते हो!

आज पंचसितारा में नाश्ता डिनर वही करते हो!

गरीबों के घर जाकर झूटमूठ के भोजन का स्वांग रचाते हो!

हर जगह नया नाटक जाल फैलाते हो!

दिन में न जाने कितनी बार जुबान बदलावाते हो!

कितना जल्दी पलट जाते हो तुम,
आज इस थाली कल उस थाली सरक जाते हो तुम!

कभी तुमने संविधान कि कसमें खायी थी!

बीच सभा जुम्मन और नन्हकु की गरीबी हटायी थी!

पर आज भी वो बात कुछ जुदा जुदा लगता है!

नन्हकु और जुम्मन का दिन वही पर लटका है!

इसलिए हर बार अटक जाते हो तुम!

आज इस थाली कल उस थाली सरक जाते हो तुम!

दलबदल कर राजनीति को गंदा करने वाले नेताओं पर एक व्यंग लिखने की कोशिश किया हूं। उम्मीद है आप सब को ज़रूर पसंद आयेगा।

मनोज कुमार दूबे

प्रवक्ता

श्री छितेश्वर नाथ सेवा स्वच्छता समिति

सिवान (बिहार ) में शिक्षक पद पर कार्यरत

निवासी: सहतवार (छितौनी ) फरसाटार, बलिया

(कापीराइट सुरक्षित)

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