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उमेश चतुर्वेदी: दिल्ली में ‘चमका’ बलिया का सितारा

हिंदी पत्रकारिता के लिए उम्मीद की किरण उमेश चतुर्वेदी को 2014 के प्रतिष्ठित ‘काका साहब कालेलकर पत्रकारिता पुरस्कार’ मिला है। बागी जनपद बलिया के बघांव गांव निवासी उमेश चतुर्वेदी आज देश की राजधानी में पत्रकारिता जगत में एक अलग पहचान स्थापित कर चुके है। इन्हें ‘काका साहब कालेलकर पत्रकारिता पुरस्कार’ मिलने पर बलिया के ही कलमकार (अब दिल्ली में) भरत चतुर्वेदी ने कुछ यूं फेसबुक पोस्ट किया है…

मत कहो आकाश में कोहरा घना है,

यह किसी की व्यक्तिगत आलोचना है

विशेषकर किसी पत्रकार को लेकर टिप्पणी करना बहुत जोखिम भरा होता है। ऊपर की दो लाईनें दुष्यंत जी की है, जो मैंने आज उमेश चतुर्वेदी के खातिर साभार लिया है। बाजारवाद के दौर में पत्रकारिता को जीविका बनाना शायद सहज हो, पर पत्रकार बने रहना कठिन है। और इन्ही कठिनाइयों से दो चार होते हुए आज उमेश जी जिस मुकाम पर खड़े हैं, उससे वो संतुष्ट हों न हों पर मेरे जैसे लोग गौरवान्वित जरूर हैं। इसलिए नहीं कह रहा कि ये मेरे गृहजनपद बलिया से हैं, (इसका अलग से अभिमान है) बल्कि इसलिए कि साहित्य और पत्रकारिता की जो जुगलबंदी उमेश जी ने रची वो इनके वय में दूसरा नहीं पढ़ा पाया।

छोटे ऊम्र में बलिदानी बलिया जिले के बघांव गांव से निकल कर देश की राजधानी जैसे महानगर के मिजाज में ढलना, कुर्ते पायजामे से अलग जींस की संस्कृति को अपनाना उमेश जी जैसे भोले युवक के लिये कितना टेढ़ा रहा होगा, इसका कल्पना भी आसान नहीं। पर आज हमे ख़ुशी है कि ये देश के बड़े पत्रकारों में शुमार हैं।

पत्रकारिता का गुण ही जीविका का बाधक है, दुष्यंत जी की उक्त लाईनें इस जोखिम को बताती है पर उमेश जी पहले दिन से अबतक ऐसे जोखिम उठाते आये हैं। इनकी पत्रकारिता का सफर, खुद कहानी बयां करती है।
यहां बहुत कुछ नहीं कहा जा सकता, थोड़े शब्दों में बड़ी बात यह है कि २०१४ का प्रतिष्ठित काका साहब कालेलकर पत्रकारिता पुरष्कार जब उमेश जी को मिला, तब पत्रकारिता जानने वालों की जमात मान ली कि इस भाव में एक नये सितारे का उदय हुआ है। कल उमेश जी को अटल पत्रकारिता सम्मान से सम्मानित किया जाना है, इस हेतु उनको हार्दिक शुभकामनाएं।

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