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नहीं रहे वरिष्ठ समाजवादी नेता शरद यादव : पढ़िए JDU के पूर्व अध्यक्ष से जुड़े 5 अनसुने किस्से

नई दिल्ली। पूर्व केंद्रीय मंत्री व वरिष्ठ समाजवादी नेता शरद यादव नहीं रहे। उनके निधन पर शोक की लहर है।हर कोई अपने-अपने तरीके से दुख व्यक्त कर रहा है। मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश और बिहार की अलग-अलग सीटों से 11 बार सांसद रहे शरद यादव के लंबे राजनीतिक अनुभव के बारे में हर कोई जानना चाहता है। यूं तो शरद यादव का लंबा राजनीतिक अनुभव रहा है, लेकिन उनकी जिंदगी के पांच किस्से ऐसे है, जो बेहद दिलचस्प है।

जेल में रहते हुए 25 साल की उम्र में सांसद बने थे शरद यादव

25 साल एक माह 7 दिन की उम्र में शरद यादव पहली बार लोकसभा का चुनाव लड़े थे। उस समय जयप्रकाश नारायण का आंदोलन ऊफान पर था। उस वक्त शरद यादव मीसा कानून के तहत जेल में थे। सरदार सरोवर डैम की ऊंचाई बढ़ाए जाने का विरोध करने के चलते शरद यादव को जेल में डाला गया था। देश में इमरजेंसी लागू होने से पहले ही शरद यादव पहली बार 7 महीने और दूसरी बार 11 महीने जेल में रहे। जेल में रहने के दौरान ही शरद यादव सर्वोदय विचारधारा के नेता दादा धर्माधिकारी के संपर्क में आए। धर्माधिकारी और जयप्रकाश नारायण बेहद अच्छे मित्र थे। उसी दौरान कांग्रेस के कद्दावर नेता और सांसद सेठ गोविंद दास का निधन हो गया था। उनके निधन से खाली हुई सीट पर जयप्रकाश नारायण ने शरद यादव को जबलपुर सीट से पीपुल्स पार्टी का उम्मीदवार घोषित कर दिया, तब शरद यादव जेल में ही बंद थे। 1974 में जेपी ने शरद यादव को अपना पहला कैंडिडेट घोषित किया था। उस वक्त आंदोलन पीक पर था, जिसका शरद यादव को फायदा मिला और वह कांग्रेस के गढ़ वाली सीट पर एक लाख से ज्यादा मतों से चुनाव जीतकर लोकसभा पहुंचे। दिलचस्प बात यह है कि वह चुनाव बांग्लादेश को लेकर पाकिस्तान से हुए युद्ध में मिली जीत के बाद हुआ था। उस उक्त शरद यादव का चुनाव चिन्ह हलधर किसान था।

कोर्ट की निगरानी में पार्टी अध्यक्ष के चुनाव में लालू यादव से भिड़े थे शरद यादव

वर्ष 1997-98 की बात है। जनता दल के अध्यक्ष चुनाव में शरद यादव जीते। लेकिन इस बात से लालू यादव नाराज हो गए। उन्होंने चारा घोटाले में जेल जाने से पहले जनता दल को तोड़कर राष्ट्रीय जनता दल बना ली थी। जनता दल के अध्यक्ष का यह चुनाव अदालत की निगरानी में हुआ था। यह भारतीय इतिहास की पहली घटना थी, किसी राजनीतिक दल के अध्यक्ष का चुनाव अदालत की निगरानी में हुआ था। संगठन के उस चुनाव में मधु दंडवते को पर्यवेक्षक बनाया गया था। उस वक्त लालू यादव बिहार के मुख्यमंत्री थे, फिर भी पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष बने रहना चाहते थे। गौर करने वाली बात यह है कि 1990 से 1995 तक दिल्ली से सबसे ज्यादा राजनीतिक सपोर्ट शरद यादव ने ही लालू यादव को दिया था। शरद यादव इस बात को लेकर आखिरी वक्त तक दुखी रहे कि जनता दल से मुलायम सिंह यादव, चमन भाई, लालू प्रसाद यादव सरीखे नेता क्यों अलग हो गए। वह आज तक समझ नहीं पाए।

ज्योतिष की सलाह पर राजीव गांधी के खिलाफ चुनाव लड़े शरद यादव

एक किस्सा यह भी है कि संजय गांधी की मौत के बाद अमेठी लोकसभा सीट पर उपचुनाव हुए। इस सीट से राजीव गांधी चुनाव मैदान में थे। किसी ज्योतिष की सलाह पर चौधरी चरण सिंह ने शरद यादव को उस उपचुनाव में राजीव गांधी के मुकाबले उतारा था। अमेठी उपचुनाव में शरद यादव को चुनाव मैदान में उतारने के पीछे नाना जी देशमुख की भी सलाह थी। ज्योतिष ने नाना जी देशमुख और चौधरी चरण सिंह से कहा था कि अमेठी से राजीव गांधी चुनाव हार जाएंगे। इसका सीधा असर केंद्र की इंदिरा गांधी सरकार पर होगी। इसी बात को आधार बनाकर शरद यादव को अमेठी उपचुनाव में उतारा गया था। हालांकि शरद यादव इस चुनाव में नहीं उतरना चाहते थे, लेकिन नाना भाई देशमुख ने कहा कि इस चुनाव में वह खुद लड़ रहे हैं, आप केवल चेहरा हैं। शरद यादव को जीत दिलाने के लिए चौधरी चरण सिंह और नाना भाई देशमुख ने ना केवल खुद खूब प्रचार किया, बल्कि विपक्ष के कई कद्दावर नेताओं से रैलियां कराई थी। हालांकि शरद यादव चुनाव हार गए थे।

2013 में इच्छा के विरुद्ध एनडीए से अलग हुए शरद

1990 के दौर में नीतीश कुमार, जॉर्ज फर्नांडिस सरीखे समाजवादी नेता लालू यादव और कांग्रेस के विरोध में बीजेपी के समर्थन में जा रहे थे तो शरद यादव इसके पक्ष में नहीं थे। लेकिन रामविलास पासवान और कुछ और नेताओं के कहने पर वह राजी हो गए थे। हालांकि शरद यादव मानते थे कि उस वक्त बीजेपी के कई नेताओं के साथ उनके निजी रिश्ते इतने अच्छे थे कि उन्होंने एनडीए मे जाने से गुरेज नहीं किया था। शरद यादव ने एक इंटरव्यू में कहा था कि लालू कृष्ण आडवाणी और अटल बिहारी वाजपेयी संविधान के दायरे में रहकर काम करना पसंद करते थे। उसी इंटरव्यू में उन्होंने यह भी बताया कि नीतीश कुमार कभी भी नरेंद्र मोदी को पसंद नहीं करते थे। इसी वजह से 2013 में जब बीजेपी ने मोदी को प्रचार समीति का अध्यक्ष बनाया तो उन्होंने बिहार में एनडीए से अलग होने का फैसला लिया। उस वक्त शरद यादव एनडीए संयोजक थे। इतना लंबा रिश्ता होने के चलते शरद यादव 2013 में एनडीए से अलग होने के पक्ष में नहीं थे, लेकिन नीतीश कुमार की जिद्द के आगे झुक गए।

नीतीश के कहने पर 2015 में लालू यादव को बिहार में महागठबंधन के लिए तैयार किया

2014 में नरेंद्र मोदी की सरकार बनने के बाद उनकी कार्यशैली को देखकर शरद यादव की इच्छा थी कि तमाम समाजवादी नेता एक मंच पर आएं। इसके लिए उन्होंने लालू यादव और नीतीश कुमार को साथ लाने का अप्रोच भी किया। शरद यादव का कहना था 2015 के बिहार विधानसभा चुनाव में बने महागठबंधन की पहल नीतीश कुमार ने ही की थी। शुरुआत में लालू यादव इसके लिए तैयार नहीं थे। शरद यादव और मुलायम सिंह यादव की अपील पर लालू यादव ने कहा था कि नीतीश कुमार ने योजनाबद्ध तरीके उन्हें जेल भिजवाया है, इसलिए वह साथ नहीं जाएंगे। एक वक्त पर नीतीश कुमार निराश हो गए थे, लेकिन मुलायम सिंह यादव और शरद यादव के समझाने पर लालू यादव बिहार में महागठबंधन बनाने को तैयार हुए थे। नीतीश कुमार ने लालू यादव को यकीन दिलाया था कि अगर दोनों मिल गए तो नरेंद्र मोदी के अश्वमेघ रथ को रोका जा सकता है। 2015 के बिहार विधानसभा चुनाव में हुआ भी ऐसा ही। शरद यादव का मानना है कि अगर 2015 में बना महागठबंधन जारी रहता तो 2019 के लोकसभा चुनाव में परिणाम कुछ और हो सकता था। साल 2017 में जब नीतीश कुमार दोबारा एनडीए में जाने की बात शरद यादव को बताने गए तो वह बेहद नाराज हो गए। शरद यादव ने कहा था कि दोबारा एनडीए में जाना नीतीश कुमार का आत्मघाती कदम हो सकता है, लेकिन वह नहीं माने और एक दिन की भीतर उन्होंने बीजेपी के साथ मिलकर सरकार बना ली थी।

मध्य प्रदेश के होकर बिहार से चार बार सांसद बने

यूं तो शरद यादव इंजीनियरिंग के स्टूडेंट रहे। वह मूलरूप से जबलपुर के होने के बावजूद उनकी पहचान बिहार के राजनेता के रूप में रही। शरद यादव बिहार के मधेपुरा से चार बार सांसद रहे। पहली बार मधेपुरा सीट से 1991 में जनता दल के टिकट पर जीत कर सांसद बने। उस वक्त राजनीति के उफान पर दिख रहे जनता पार्टी के प्रत्याशी आनंद मोहन को हराया था। 1996 में शरद यादव जनता दल के टिकट पर फिर से सांसद बने। 1998 में शरद यादव जनता दल के टिकट पर राष्ट्रीय जनता दल के लालू प्रसाद यादव से चुनाव हार गए थे। लेकिन साल 1999 में शदर यादव ने जनता दल यूनाईटेड (जेडीयू) के टिकट पर चुनाव लड़ते हुए लालू प्रसाद को हराकर पिछली हार का बदला चुकता कर दिया था। 2004 में शरद यादव एक बार फिर लालू प्रसाद यादव से चुनाव हार गए। 2009 में शरद यादव राजद के रवींद्र चरण यादव को पराजित कर चौथी बार मधेपुरा से सांसद बने। 2014 में शदर यादव राजद प्रत्याशी रहे राजेश रंजन ऊर्फ पप्पू यादव से चुनाव हार गए।

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