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आज भी आंखें नम हैं...


आज भी आंखें नम हैं
एक सूरज था कि तारों के घराने से उठा 
आंख हैरान है क्या शख़्स ज़माने से उठा 
यह आंखें आज से 15 साल पहले भी भीगीं थी और आज भी नम है, उनकी याद में जो गांव गिरान के गवयी लोगों के हमदर्द थे। शिक्षक थे। शिक्षाविद् थे और राजनीतिज्ञ थे। 
राजनीति शब्द की ब्याख्या जब भी होती है, यह ठेठ गवई नेता की छवि इतनी धवल दिखती है, जिसकी समानता हम दूसरे से नहीं कर पाते। 
राजनीति में दबंग दखल रखने वाले इस शख्स की उठान इतनी बड़ी थी कि अपने जीवन के आखिरी दिनों तक जिम्मेदारियों से मुक्त नहीं हो पाया। 
वह राजनीतिक फकीर थे। लोगों का साथी थे और इससे इतर एक नेक दिल इंसान। आज इनकी पुण्य तिथि है। हम बात कर रहे हैं, स्वर्गीय विक्रमादित्य पांडेय ( Vikramaditya Pandey) की। आज वो हमारे बीच नहीं है, पर उनकी यादें आज भी ताजा है और इस तरह वह आज भी हमारे बीच हैं। 
स्वर्गीय विक्रमादित्य पांडेय की राजनीतिक उपलब्धियां बेमिसाल रही, पर अफसोस कि उसे वाजिब शब्द नहीं मिले। मैं यह नहीं कह सकता कि बलिया की धरती लेखकों और शोधकर्ताओं से सुनी है, पर कहीं इनके लिए शब्दों का अभाव दिखता है तो लगता है कि कुछ गलत है। 
मैं आज उनकी पुण्यतिथि पर उन्हें सादर नमन करता हूं।

भरत चतुर्वेदी 'पत्रकार'
नई दिल्ली की फेसबुकवाल से

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