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फिर उसने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा...


फिर उसने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा...
बड़ा ही पढ़ाकू छात्र था वह, कक्षा में आता था प्रथम,
स्कूल से कालेज तक नंबर, अधिक आते उसी के हरदम।
शिक्षक हो या छात्र हर कोई उसी की मिसाल देता था,
बात भी सही थी, कि कोई भी छात्र नहीं था उसके सरेखा।

फिर उसने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा...
मल्टीनेशनल कंपनी में जाब और दौलत आयी बेशुमार,
आलीशान बंगला, नौकर चाकर, द्वार पर खड़ी मोटर कार।
लोग कहने लगे थे 'कितना होनहार लड़का है यह भी,
बदल डाली है जिसने पूरे परिवार की भाग्य की रेखा।

फिर उसने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा...
नौकरी विदेश में थी, तो शादी भी वहीं पर हो गई,
घर परिवार और गांव जवार में सिर्फ चर्चा होती रह गई।
माता-पिता, भाई-बंधु किसी को भी नहीं बुलाया उसने,
उन्नति पथ के सब अवरोधों को उसने उठा उठाकर फेंका।

फिर उसने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा...
बीता समय और माता-पिता बूढ़े हो भगवान को प्यारे हो गये,
लगा रक्खे थे अपने बेटे से वे अब नष्ट अरमान सारे हो गये।
कमाल आधुनिक शिक्षा का रहा या खामी परवरिश की,
या फिर दोष किसी का नहीं, ऐसी ही रही होगी विधि की लेखा।

फिर उसने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा...


विंध्याचल सिंह
शिक्षक
यूपीएस कम्पोजिट बेलसरा, चिलकहर
 बलिया (उ.प्र.)

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