To Learn Online Click here Your Diksha Education Channel...


ads booking by purvanchal24@gmail.com

सनबीम स्कूल बलिया के निदेशक को याद आया बचपन और लिख दिया 'वो भी क्या दिन थे...!?!'


शायद फिर नहीं वापिस लौटेगी 'वो बचपन वाली दिवाली! आज उम्र के इस पडाव पर आकर भी वो बचपन की मधुर यादें अक्सर ही मन के एक कोने में दस्तक दे ही जाती है। और वो सारे विस्मृत पल फिर से आँखों में जीवन्त हो उठते हैं। जैसे हमारा बचपन वापिस नहीं लौट सकता, ठीक वैसे ही वो दिवाली भी ना लौट सकेगी। कितना अलग था ना वो परिवेश। हर छोटे-बड़े अवसर हम बच्चे ही क्यों पूरे गाँव भर के लिए ही उत्सव बन जाते।अमीरी-गरीबी के भेद-भाव से परे पूरा गांव ही मद-मग्न दिखाई देता। हालांकि आप सब भी अनुभव करते होंगे कि आज सभी त्योहारों के रंग और उद्देश्य बदल गए हैं।

कुछ यादें आप सभी के साथ साझा करना चाहता हूं, जिसमें मुख्य रूप से पहला है घर की साफ-सफाई। आज जिसके पास साधन है वो झट से दिवाली के पहले पूरे घर का रंग-रोगन करा लेते हैं तो कुछ और इंटिरियर्स डेकोरेटर से पूरे घर का नक्शा पलट करा डालते हैं और बाकि के बचे लोग घर के सदस्यों के सहयोग से नोक-झोंक, खिंचातानी करते अंततः पुरे घर की सफाई कर ही ले जाते हैं। 

सफाई तो होती थी साहब हमारे जमाने में, जब रंग नहीं पीली मिट्टी का उपयोग कर घर को चमकाया जाता था,  क्योंकि दीवारें भी मिट्टी की और घर के फ़र्श भी मिट्टी के ही... दिवाली के एक माह पूर्व ही घर के बड़े लोग गंगा किनारे से बैलगाड़ी में भर कर पीली मिट्टी घर में इकट्ठा कर देते और समय समय पर पानी का छिड़काव कर उसे मुलायम किया जाता। फिर पुराने कपड़े का पोचारा बनाकर घर की दीवारों को रंगा जाता। घर के सभी सदस्यों में घर के अलग अलग हिस्से की जिम्मेदारी सौंप दी जाती। मसलन बंगला, गौशाला और बरामदा पुरुषों के हिस्से और ड्योढी के अन्दर का हिस्सा महिलाओं का। पीली मिट्टी में गोबर मिलाकर अन्तिम यानि फाइनल टच दिया जाता।

हम बच्चों के पास तो अपने अलग ही उत्साह के स्रोत थे, क्योंकि दिवाली के ठीक पहले गंगा जी बाढ़ के बाद नदी किनारे नई, मुलायम बिल्कुल लैनू (दही के ताजे मक्खन) की तरह मिट्टी छोड़ जाती और हम बच्चों को तो प्रकृति की जैसे नेमत ही मिल जाती, हम में से प्रसिद्घ बाल कलाकार अपनी सोच और कौशल के अनुसार खिलौने और मूर्तियां गढ़ने की पारम्परिक प्रतियोगिता में अनायास ही शामिल हो जाते और कुछ हम जैसे उभरते कलाकार माटी के दीये और ढंकनी बनाकर ही खुश हो लेते। कांच की गोली थोड़ी महंगी पड़ती अर्थात तब उसका मूल्य भी हमरी जेब की मुद्रा से जरा भारी ही पड़ जाता सो मिट्टी की ही गोली भी बना लिया करते।

हमारे समय में मिट्टी से बने हुए अलग-थलग आकार और डिजाइन के बहुमंजिला इमारतों का भी खूब प्रचलन था और बच्चों में सबसे बेहतर करने की होड़...

गांव के कुम्हार की पाट भी एक महीने पहले से ही तीव्र गति से घूमना शुरू कर देती और कुछ प्रसिद्ध खिलौने जैसे मिट्टी के बर्तन, जांत, घंटी, चूल्हा चाकी, हाथी, घोड़े, ऊंट और सिपाही बहुतायत में बनकर और कुम्हार की आव में पकने के साथ ही दैनिक हाट की शोभा बढ़ाने के लिए मुस्तैदी से आ डंटते। एक खांची ( बांस की कोईन से बने हुई टोकरी) खिलौनों के बदले कुम्हार सेर -2 सेर अनाज ही जुटा पाता था क्योंकि मुद्रा का चलन जरा कम ही था। 

त्योहारों में धर्मान्धता और व्यवसायिकरण नहीं होने से गणेश-लक्ष्मी जी की पूजा का भी कोई विधान नहीं था।

हां हम बच्चों को खुटकी, बताशे, पटऊरा तथा चीनी के बने चुक्का-भरूका भी कुछ कम नहीं लुभाते थे। हालांकि आप इसे ग्रामीण अंचल की विश्व प्रसिद्ध मिठाई भी कह सकते हैं क्योंकि इन्होंने अभी तक अपनी मौलिकता और मौजूदगी दोनों को ही बरकरार रखा है।पटाखों में केवल  चिटपुटिया,काग और छूरछूरी ही मिलती थी, बहुत बाद में बिडिया और बम आया, जिसको बच्चे चोरी छुपे ही खरीदते थे।

दिवाली की शाम आते ही बर्रे के तेल में डूबी पुराने कपड़ों की बनी बाती की गमक और दीये की जगमगाहट से पूरा गांव ही रौशन हो उठता। हालांकि दिवाली का अगला दिन भी हमारे लिए कम व्यस्तता लेकर न आता जब हम अपनी ही धून में गांव में घूम घूम कर जले हुए दियों की कालिख और बाती साफ कर टेकुई से छेद कर तरजूई बनाने की जुगत में वापिस भिड़ने लग जाते। आज भी त्योहारों पर खुब रौनक रहती है पर वो बचपन वाली निश्छल मुस्कान फिर से चेहरे पर आ नहीं पाती।

जाने कहां गये वो दिन.....!?!

जरा सा रुक कर सोचिएगा जरुर...

डॉ. कुंवर अरूण कुमार सिंह 'गामा सिंह'
निदेशक
सनबीम स्कूल अगरसंडा, बलिया

Post a Comment

0 Comments