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जहां में तुझी से करूं मैं मुहब्बत, मगर...


तड़प अब भी कितनी, सनम जांचते हैं,
मोहब्बत की चिट्ठी चलो बांचते हैं।

जहां में तुझी से करूं मैं मुहब्बत,
मगर तुझ से कहते ये लब कांपते हैं।

न चाहूं कभी मैं, ये दौलत, ये शोहरत,
सदा बस दुआ में तुझे मांगते हैं।

सजा जब भी देना, जरा यह समझना,
कभी इक ही लाठी, न जग हांकते हैं।

उड़ाने भले आसमानों से आगे,
मगर सरहदें हम कहां लांघते हैं।

रजनी टाटस्कर, भोपाल

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