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Pitru Paksha 2022 : पितृपक्ष एक अवसर है पितरों को प्रसन्न करने का, श्रद्धा के साथ श्राद्ध का है विशेष महत्व

हिंदू धर्म में पितृपक्ष का विशेष महत्व होता है। हिंदू पंचांग के अनुसार, पितृपक्ष भाद्रपद मास की पूर्णिमा तिथि से प्रारंभ होकर आश्विन मास की अमावस्या तक रहते हैं। पितरों को हिंदू धर्म में देवतुल्य माना जाता है। पितृपक्ष में तर्पण और श्राद्ध का विशेष महत्व माना गया है। मान्यता है कि पितृ पक्ष में पिंड दान, श्राद्ध और तर्पण करने से पितर प्रसन्न होते हैं और सुख-समृद्धि का आशीर्वाद देते हैं। 

बैरिया, बलिया। पितृ पक्ष व तर्पण में बहुत गहरा और सूक्ष्म ज्ञान विज्ञान छुपा हुआ है। इसका पालन हर सनातन धर्म मानने वालों को करना चाहिए। इसकी जानकारी देते हुए प्रसिद्ध कर्मकांडी ज्योतिष के ज्ञाता व संस्कृत प्रचारक डॉ ओंकार नारायण द्विवेदी ने बताया कि हमारे धार्मिक संस्कारों व अनुष्ठानों में बहुत सी प्रक्षिप्त अथवा असंबंध बातें आ जाती हैं या मिला दी गई है। लेकिन इससे यह नहीं समझना चाहिए कि मूल गंगा मैली हो गई है। 

हमारा धर्म कल्याणकारी पवित्र व उद्धारकारिणी है। तर्पण में जिन बातों का ध्यान रखना चाहिए। उस समय पूर्णिमा को ऋषि तर्पण होने से इसका समावेश हो जाता है। दिवंगत व्यक्ति के निधन जिस तिथि को हुआ हो शुक्र या कृष्ण पक्ष का विचार किए बिना उसी तिथि को तर्पण करना चाहिए। इसमें अपवाद केवल चतुर्दशी तिथि का है। उस दिन को छोड़ कर त्रयोदशी अथवा अमावस्या को तर्पण करना चाहिए।

यदि मृतक का तिथि ज्ञात ना हो तो नि:संकोच अमावस्या को तर्पण करना चाहिए, क्योंकि यह शास्त्र में वर्णित है। तर्पण मे ताम्रपात्र, जल, अक्षत, काले तिल, दूब, कुशा, जौ थोड़ी सी हल्दी व गाय का घी होना चाहिए। आधुनिक कंपलेक्स हो या विदेशों में परिस्थिति गत आवासीय बंधन हो तो यह तर्पण घर के बाहर बालकनी में कर सकते हैं। दक्षिण दिशा की ओर मुख करके तर्पण करना चाहिए। दोपहर के समय का विशेष ध्यान देना चाहिए। तर्पण करते समय केवल अपने पूर्वजों को नहीं, बल्कि दिवंगत तमाम संबंधियों का भी तर्पण करना चाहिए।

जिनका तर्पण ना हुआ हो तो यह जगत कल्याण का कार्य है। यह हमारे सनातन धर्म की विलक्षण विशेषता भी है। संस्कृत भाषा का अल्प ज्ञान अर्थ को अनर्थ बना देता है। इसलिए अपने भाषा में भी पूर्वजों को स्मरण कर तर्पण करना चाहिए। यदि पुरोहित तर्पण करवा रहे हो तो श्रद्धा पूर्वक उनको दक्षिणा देना चाहिए। दक्षिणा की फीस पुरोहित को मांगना नहीं चाहिए। इस भ्रम में ना रहे कि अधिक लोगों को भोजन कराने से हमारे पूर्वजों को उत्तम लोक प्राप्त होगा। यह दिखावा है। इस से दूर रहें। 

श्रद्धा पूर्वक जलांजलि, तिलांजलि व भावांजलि ही श्राद्ध और तर्पण है। इसमें भावनात्मक और आत्मीय अर्पण होनी चाहिए। धन की समस्या के कारण तर्पण सम्भव न हो तो दोनों हाथ आकाश की ओर उठाकर श्रद्धा से निवेदन कर तर्पण करें।हमारे शास्त्र में बहुत उदाहरण नियमों का विवरण है, जिससे हमारे पूर्वजों का तर्पण हो जाएगा। याद रहे धार्मिक संस्कार हमारे धर्म का जीवन स्तंभ है।इसका पालन करें।


शिवदयाल पांडेय मनन

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