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हौंसला बुलंद हो तो हर मुश्किल आसान : कुछ ऐसी ही है मीनू पाण्डेय की कहानी

लखनऊ। वो दिव्यांग है, दाहिना पैर पोलियो ग्रसित होने से चलने में दिक्कत होती है, लेकिन उसके हौसले बुलंद हैं। वह बड़ा सिंगर बनना चाहती है, गायकी के क्षेत्र में राष्ट्रीय स्तर कुछ करना चाहती है। उसकी सुरीली आवाज के सभी कायल है। जब वह पारंपरिक लोकगीतों व गानों से अपनी सुरीली आवाज का जादू बिखेरती है तो सभी मंत्रमुग्ध हो जाते है। अभी उसकी राह में कुछ बाधाएं है, लेकिन वह अपनी दिव्यांगता को आड़े नहीं आने दे रही है। उसने दृढ़ संकल्प कर लिया है कि अपने हौसलों को पंख देगी और कुछ बनकर दिखायेगी। 

उसके इस हौंसले को उड़ान भरने में परिजनों के साथ ही रिश्तेदार व मित्र भी पूरा सहयोग कर रहे हैं। मीनू कहती हैं, ना थके अभी पैर, ना अभी हिम्मत हारी है, हौसला है जिंदगी में कुछ कर दिखाने का, इसलिए सफर अभी जारी है। बीते करीब डेढ़ दशक से लखनऊ में रह रही मूलरूप से ग्राम सेमरी, परसपुर गोंडा निवासी मीनू पाण्डेय के पिता राजकुमार पाण्डेय किसान और मां उषा पाण्डेय गृहणी है। भाई डॉ जितेन्द्र पाण्डेय है।

अभाव में भी दिखा दिया अपनी आवाज का प्रभाव

मीनू की मां उषा पाण्डेय अक्सर घर में पारंपरिक लोकगीत गाती थी। जिसे वह बचपन में ध्यानपूर्वक सुनती रहती थी और उसे गाने का प्रयास करती थी। मां से प्रेरित होकर ही मीनू ने संगीत के क्षेत्र में कदम रखा, जिसमें मां के साथ ही पूरे परिवार ने सहयोग किया। वर्ष 2008 से लखनऊ में रह रही मीनू पाण्डेय ने पढ़ाई के साथ ही संगीत का भी कोर्स किया। मीनू बताती हैं कि परिवार में कई बार आर्थिक बाधाएं भी आईं लेकिन माता पिता व बड़े भाइयों ने उसकी पढ़ाई में कोई दिक्कत नहीं आने दी। वर्ष-2015 में मीनू ने भातखण्डे संगीत महाविद्यालय से संगीत में एमए किया। 

वह टैलेंट हंट कार्यक्रमों में प्रतिभाग कर चुकी है और फाइनल तक भी पहुंची थी। लखनऊ महोत्सव सहित कई सांस्कृतिक मंचों पर भी अपनी सुरीली आवाज का जादू बिखेर चुकी है। करीब 9 वर्ष पूर्व मीनू की मुलाकात जानकीपुरम निवासी नीलाक्षी लोक कल्याण समिति के रवि वर्मा व नीलम वर्मा से हुई। इसके बाद से मीनू संस्था से जुड़े बच्चों को संगीत की निःशुल्क शिक्षा दे रही है। वर्तमान में भी वह लोकसंस्कृति शोध संस्थान द्वारा आयोजित लोक चौपाल सहित अन्य आयोजनों में पारंपरिक लोकगीतों को सुनाकर अपनी सुरीली आवाज का जादू बिखेर रही है।

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