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रो रहा अब सावन प्यारा...


कितना बदल गये सावन,
आषाढ़ लाकर छोड़ जाता।
नामकरण तेरा करवाया था,
फुहारों का सोता साथ रखे।

मन्द हवाएं तुम्हें घुमाती थी,
इधर घुमाती, उधर घुमाती।
अपनी चाल से ऊपर उड़ाती,
बाधक जब सामने आ जाते।

पेड़, फूलों से टक्करा देती थी,
आगोश में भर कर खूश्बू।
भींगे आंचल सावन आता था,
आर्यावर्त की सीमा चूम कर।

हवाएं इतनी इतराती थी,
पुष्प सहारा लेकर विन्ध्याचल।
झूले पर कजरी गाता था,
माह पांचवें, वसंत स्वरूप में।
केश गजरा से सज जाते थे

रो रहा अब सावन प्यारा, 
जन संसाधन का दोहन करता।

रजनीकांत, सहायक अध्यापक   
कम्पोजिट विद्यालय चंदुकी
ब्लॉक हनुमागंज, बलिया

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