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छोटी उम्र में सिर से उठा बाप का साया, बकरी पालकर मां ने पढाया, कुछ ऐसी है UPSC पास करने वाले विशाल की कहानी

‘लहरों से डर कर नौका पार नहीं होती, कोशिश करने वालों की हार नहीं होती’ इससे पहले आपने कभी ना कभी ये पंक्तियां जरूर सुनी या पढ़ी होंगी। पर ये पंक्तियां ऐसी नहीं लिखी गईं है, इसे बहुतों ने साबित भी किया है। इसके साथ ही यह भी बताया कि कम संसाधन के साथ भी लक्ष्य को हासिल किया जा सकता है। देश की सबसे कठिन मानी जाने वाली परीक्षा में सफलता प्राप्त कर होनहारों ने साबित किया है कि मेहनत का कोई विकल्प नहीं होता। इसके आगे कोई भी संघर्ष बड़ा नहीं होता। ऐसी ही कई सफल उम्मीदवारों की कहानियां सभी के सामने आ रही हैं। इसी कड़ी में हम लेकर आए हैं, बिहार के विशाल की कहानी, जो अपने आप में संघर्ष और इसके बाद मिली सफलता की सच्ची कहानी है। 

यूपीएससी में सफलता प्राप्त करने वाले बिहार के मुजफ्फरपुर जिले के रहने वाले विशाल कुमार बेहद गरीब घर से ताल्लुक रखते हैं। उनके पिता की वर्ष 2008 में मौत हो गई थी। वे मजदूरी करके अपने घर का पालन-पोषण करते थे। उनके निधन के बाद घर के हालात बेहद खराब हो गए थे। विशाल की मां रीना देवी ने बकरी और भैंस पालकर अपने परिवार का भरण पोषण किया। मेधावी विशाल ने साल 2013 में आईआईटी कानपुर में प्रवेश लिया। वहां से पासआउट होने के बाद विशाल ने रिलायंस कंपनी में जॉब की। संघ लोक सेवा आयोग (यूपीएससी) द्वारा आयोजित सिविल सेवा परीक्षा-2021 में विशाल ने 484वां रैंक प्राप्त किया है। 

विशाल अपनी सफलता का पूरा श्रेय अपने परिवार और अध्यापक गौरी शंकर प्रसाद को देते हैं। विशाल के अनुसार गौरी शंकर ने मुश्किल हालात में उनकी बहुत मदद की है। उन्होंने विशाल के पढ़ाई की फीस दी। पैसों की तंगी के समय अपने ही घर में रखा। विशाल नौकरी करने लगे थे, तब अध्यापक ने ही उन्हें नौकरी छोड़कर यूपीएससी की तैयारी करने को प्रोत्साहित किया। इस दौरान भी अध्यापक गौरी शंकर ने उनकी आर्थिक मदद की। वहीं, अध्यापक गौरी शंकर के अनुसार विशाल शुरू से ही पढ़ने में काफी अच्छा था। पिता की मौत के बाद उसने और अधिक मेहनत करनी शुरू की और आज सफलता के इस मुकाम को हासिल किया है। उनकी सफलता से उनके गांव मकसूदपुर में खुशी का माहौल है। घर पर बधाई देने वालों का तांता लगा है। कोई उनकी मिसाल दे रहा है तो कोई प्रेरणा ले रहा है। 

विशाल ने बचपन से झेला है संघर्ष

विशाल वर्ष 2009 में बगल के गांव छपरा स्थित रामकिशोर उच्‍च विद्यालय में आठवीं के छात्र थे, तभी पिता बिकाऊ प्रसाद का निधन हो गया। मां रीना देवी पर तीन बच्‍चों का बोझ था। जीवन की राह मुश्किल थी, मगर बच्‍चों की पढ़ाई के प्रति लगन देख समाज आगे आया। उसकी मदद से परिवार की गाड़ी आगे बढ़ी। गांव के शिक्षक गौरी शंकर का विशेष स्नेह परिवार से रहा। बगल के गांव शाहपुर के एक शिक्षक गौरीशंकर प्रसाद का सबसे बड़ा योगदान रहा है। पढ़ाई के दौरान उसकी आर्थिक परेशानियों से लेकर उसे मार्गदर्शन करने में उनकी महती भूमिका रही है। उन्होंने ही रिलायंस व निजी कोचिंग संस्थान की नौकरी छोड़ कर दिल्ली में यूपीएससी की तैयारी कराई। विशाल ने बताया कि गौरीशंकर सर व उसकी मां की प्रेरणा से वह इस मुकाम तक पहुंचा है। 

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