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होता कहां है आपका दीदार इन दिनों...


होती है बात-बात पे तकरार इन दिनों,
अच्छे नहीं हैं वक्त के आसार इन दिनों।
लगते ख़फ़ा-ख़फ़ा से हैं सरकार इन दिनों,
होता कहां है आपका दीदार इन दिनों।
अखबार कह रहे कि, हो गुलजार इन दिनों,
लेते अदब से नाम भी फ़नकार इन दिनों।
चेहरे पे लग रहा है कि चेहरा है इक नया,
लगते हुनर से आप अदाकार इन दिनों।
मंजिल की राह में जो मेरे साथ-साथ थे,
बनकर खड़े हैं वो सभी दीवार इन दिनों।
छूटा जो रोजगार तो बेकार हो गई,
करती हूं खुद से देखिये तकरार इन दिनों।
टूटे सभी हैं ख़्वाब लबों पर है जान अब,
मौसम की फ़सल पर है बड़ी मार इन दिनों।
रजनी टाटस्कर, भोपाल (म.प्र.)









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