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अपने भी दिन आ जाएंगे, दृष्टिकोण अब बदलो तो...


दृष्टिकोण
गुमशुम से क्यों पड़े हुए हो,
उठकर कुछ भी बोलो तो।
अंतर में पीड़ा है कैसी,
व्यथा गांठ कुछ खोलो तो।

माना अंधेरी रातें हैं,
गम की अविरल बरसातें हैं।
हृदय दग्ध करती बातें हैं,
उठकर मुंह को धो लो तो।

निष्ठुर दुनिया कब रोती है,
औरों का वह कब होती है।
तुमको और रुलाएगी वो,
उसकी बातें जो लो तो।


समय हमेशा कब सोता है,
एक सा मौसम कब होता है।
रात्रि अनंतर दिन होता है,
उठ जाओ और संभलो तो।

दो दिन ही जग में रहना है,
इतने में सब कुछ करना है।
अपने अपने ही होते हैं,
प्रेम सुधा रस घोलो तो।

सुख दुख के क्रम आते जाते,
कभी हंसाते कभी रुलाते।
अपने भी दिन आ जाएंगे,
दृष्टिकोण अब बदलो तो।

      
विंध्याचल सिंह
यू पी एस कम्पोजिट बेलसरा
चिलकहर, बलिया।

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