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भारत दर्शन समूह बलिया की नैमिषारण्य यात्रा : सचमुच में पृथ्वी पर है वैकुंठ धाम, पढ़ें डिटेल्स

बार-बार सुनते थे, पृथ्वी पर भी वैकुंठ धाम है। मन में जानने की उत्कट इच्छा होती थी। कहां है? कैसा है? क्या वहां जाया जा सकता है? कैसे जाया जाएगा? आदि प्रश्न मन में सदैव उठते थे। तभी हमारे 'भारत दर्शन समूह' के साथी शिव प्रकाश तिवारी जी ने नैमिषारण्य धाम यात्रा का प्रस्ताव रखा। देखते देखते सबकी सहमति बन गई। किसी कारण वश भोला जी शामिल नहीं हो पाए जिनकी कमी सभी को पूरे यात्रा में खलती रही, परन्तु मानसिक  रूप से हमारे साथ रहे।

2 जून को उत्सर्ग एक्सप्रेस से हमारी यात्रा बलिया स्टेशन से शुरू हुई। मन अत्यंत प्रफुल्लित था। सुबह लखनऊ सिट्टी पर उतर गए। नित्य कर्म करने के पश्चात चाय पी और केशरबाग बस स्टेशन से उत्तर प्रदेश परिवहन निगम की बस द्वारा नैमिषारण्य के लिए यात्रा आरंभ की। नैमिषारण्य लखनऊ से 95 किमी दूर सीतापुर जनपद में स्थित है, इसे आठवां वैकुंठ धाम कहा जाता है। यह हिन्दू धर्म का एक महत्वपूर्ण पौराणिक तीर्थ स्थल है। 88 हजार ऋषि-मुनियों की तपस्थली है।ऐसी मान्यता है कि कलयुग में समस्त तीर्थों का निवास स्थली नैमिषारण्य ही है। जेठ का महीना, तपती धूप, तापमान 40°c, यात्रियों से खचाखच भरी हुई बस में यात्रा करना दुश्कर था, फिर भी सुहृद मित्रों का साथ और पहुंचने की प्रबल इच्छाशक्ति के आगे यात्रा की दुश्वारियां समझ में नहीं आयी। हमारी यात्री बस नैमिषारण्य बस स्टेशन पहुंच गयी। वहां से e-रिक्सा द्वारा चक्रतीर्थ पर पहुंचे।

चक्रतीर्थ की छटा मनमोहक थी। श्रद्धेय सुधीर कृष्ण शास्त्री आचार्य जी नैमिषारण्य में उपस्थित तो न थे, परंतु हमारे लिए सभी अनुकूल व्यवस्था की थी। उन्होंने अभिषेक पंडित जी को मार्ग दर्शन के लिए भेजा था। वहां से शुकदेव टीला स्वामी नारदानंद आश्रम पहुंचे। बैग तथा अन्य सामान कमरे में रखने के पश्चात् मां गोमती में स्नान किया और वापस आकर आश्रम में बना शुद्ध, सात्विक, ताजा प्रसाद ग्रहण किया।

शाम 5 बजे से आरक्षित साधन द्वारा नैमिषारण्य दर्शन शुरू हुआ। सबसे पहले हम सभी दधिचि आश्रम पहुंचे। मानव कल्याण एवं राक्षसों के विनाश के लिए महर्षि दधीचि ने यही पर अपनी अस्थियों को इन्द्र को दान किया था। आश्रम में एक बड़ा कुण्ड है, जिसे दधिचि कुण्ड कहा जाता है। इसमें सभी तीर्थों का जल मिश्रित है। इसी कारण इस क्षेत्र को मिश्रिख कहते हैं। कुण्ड में स्नान से सभी तीर्थों का पुण्य प्राप्त होता है। आश्रम में मन्दिरों के अतिरिक्त कल्प वृक्ष है, जो मनोवांछित फल प्रदान करता है। यहां की अनुभूतियों को शब्दों से व्यक्त नहीं किया जा सकता है, केवल केवल महसूस किया जा सकता है।

यहां से हम सभी रुद्रावर्त महादेव मंदिर पहुंचे।इसे रुद्रावर्त तीर्थ, रुद्रावर्त कुण्ड, गुप्त महादेव आदि नामों से जाना जाता है। यह महादेव का ऐसा अनोखा और एक मात्र मंदिर है, जहां शिवलिंग दिखाई नहीं देता है और कुण्ड गोमती नदी के जल से पटा रहता है। कुण्ड में दूध,फल-फूल, बेलपत्र आदि महादेव को चढ़ाया जाता है। श्रद्धां पूर्वक चढ़ावा को महादेव स्वीकार करते हैं और चढ़ावा कुण्ड में डूब जाता है।

यहां से देवदेवेश्वर धाम पहुंचे। यह महादेव को समर्पित मंदिर है। यहां का प्राकृतिक छटा मनमोहक थी और आध्यात्मिकता से पूर्ण था।समीप ही स्थित बाबा सेतुबंध रामेश्वरम मंदिर में भी दर्शन का लाभ प्राप्त हुआ। यहां से हम सभी शिव शक्ति महायाग पहुंचे। यहां पर विश्व का सबसे बड़ा यज्ञशाला देखा जिसमें हर प्रहर मंत्रोच्चारण एक अनूठा आध्यात्मिक माहौल बना रहा था। यही पर व्यास गद्दी एवं 108 खम्भो का बन रहा राधा-कृष्ण मंदिर देखा।

फिर चार धाम मंदिर पहुंचे, जहां जगन्नाथ धाम, बद्रीनाथ धाम, रामेश्वरम धाम एवं द्वारिकाधीश धाम का दर्शन करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। फिर माता रानी ललिता देवी शक्ति पीठ मंदिर पहुंचे। यहां माता रानी के दर्शन मात्र से ही दु:ख,दर्द एवं कष्ट दूर हो जाते है। यह 51शक्तिपीठों में से एक महत्वपूर्ण शक्ति पीठ है। यहां माता का हृदय गिरा था। माता रानी अपने भक्तों की हर मुराद पूरी करती है। नैमिषारण्य का सबसे प्रमुख दर्शन स्थल है।

इसके बाद हम सभी व्यास गद्दी पहुंचे। 5099 साल पुराना वटवृक्ष का दर्शन किया। इसी वटवृक्ष के नीचे बैठकर महर्षि वेदव्यास जी चार वेद,अठ्ठार पुराण तथा अन्य पौराणिक ग्रंथों की रचना की थी।इसी  के समीप भगवान मनु एवं देवी सतरूपा का दर्शन किया। यहां से हनुमान गढ़ी पहुंचे। यहां हनुमान जी दक्षिणमुखी हैं दर्शनोपरांत चक्रतीर्थ पर आरती दर्शन किया।वापस आश्रम आ के प्रसाद ग्रहण करके रात्रि विश्राम किया।अगले दिन हम सभी चक्रतीर्थ में स्नान किए। नैमिषारण्य धाम का सबसे प्रमुख तीर्थ स्थल है। चक्रतीर्थ में एक बड़ा कुण्ड है जो बीच में गोल है। कुण्ड कभी भी सुखता नहीं है। ऐसी मान्यता है कि चक्रतीर्थ में पाताल लोक के अक्षय जल स्रोत से जल आता रहता है। यहां से पाताल लोक जाने का रास्ता है। चक्रतीर्थ के बारे कथा प्रचलित है कि जब राक्षसों के उत्पात से ऋषि मुनियों के धार्मिक अनुष्ठानों में विघ्न बाधा उत्पन्न होने लगी तो ऋषि मुनि ब्राह्माजी पास जाकर अपने धार्मिक अनुष्ठानों को निर्विघ्न सम्पन्न कराने का आग्रह किया, तब ब्रह्मा जी ने चक्र छोड़ाऔर कहा कि यह चक्र जिस स्थान पर गिरेगा, उस स्थान पर किसी प्रकार की कोई बाधा नहीं आएगी। एक अन्य मान्यता के अनुसार भगवान विष्णु जी का चक्र भी यही गिरा था। 

चक्रतीर्थ में स्नान के उपरांत हम सभी माता रानी ललिता देवी शक्ति पीठ का दर्शन-पूजन किया। इसके बाद आद्य विष्णु शक्ति मंदिर (आन्ध्रा मंदिर) में दर्शन किया। इस प्रकार  हम सबका नैमिषारण्य दर्शन की पावन यात्रा सम्पन्न हुई। आप सभी से विनम्र आग्रह है कि कभी  समय मिले तो इस पावन धाम की यात्रा जरुर करे। 

भोला जी आपकी कमी पग पग पर खलती रही आपका कार्य मुझे करना पड़ रहा है। माता रानी अपनी कृपा दृष्टि सब पर बनाए रखें। 

जय माता दी

प्रस्तुति : अजय पांडेय शिक्षक
ग्रुप लीडर
'भारत दर्शन समूह' बलिया की फेसबुक वाल से


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