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आप आफत को सिर माथे लपकती चुम्बक हो 'मां'


नाउम्मीदी, नासमझी, उखड़ती सांस
बांध ले जब माहुर, जहर अपने पाश 
तो फौरन पहुंचे मां' के पास
क्योंकि 'मां', आप
उम्मीद की रोशनी हो
अनकहे को समझती हो
रहस्यमयी जीवन कृति हो
बला से बचाने की डिठौरी हो।

घृणा, बेनूरी, औ मुश्किलात घड़ी
तोड़ने पर अमादा रहम की लड़ी
तो बगैर बताये पहुंचे 'मां' के पास
क्योंकि 'मां', आप
बेबादल प्यारी बरसात हो
अगम राहो की प्रदर्शक हो
विध्वंसक लहरो की कहर हो
मुश्किल घड़ी की बलिष्ठ ढाल हो।

दृग तर, बेचैन, टूटी बिखरी जोर
न सोचो कोई कसर न कोई कोर
तो क्षेती पहुंचे 'मां' के पास
क्योंकि 'मां', आप
चितवन की खुबसूरत सब़ीह हो
हसीन लम्हातों की अमन चैन हो
टोक कर पटरी पर लाती जोर हो
बिखरे जिगर की बेजोड़ ढाढस हो।

चुभती दर्द, दरकते नाते, खारा उफनता समंदर
भरपूर रोको मानसिक व कायिक बवंडर
तो हड़बड़ाए पहुंचे 'मां' के पास
क्योंकि 'मां', आप
ढ़ेरों दर्द छिपाती बदलाव की अच्छी बात हो
रिश्तों को वाकई रुप देती बांडिंग हो
आग बबूला पे भटकन रहित सबक हो
समझ भरा दरिया सी छलकाती प्यार हो।

चकरी, भंवर, पिसे मरघट में आफत
गर प्राप्त करना हो सर्व हिफाजत
तो दनदनाए पहुंचे 'मां' के पास 
क्योंकि 'मां', आप
हर भंवर से निकालने की तरकीब हो
उखड़ती सांसो के लिए प्राण वायु हो
आफत को सिर माथे लपकती चुम्बक हो
फिलवक्त आपदकाले जीने की उचित सलाह हो।


विनोद कुमार मौर्य
सहायक अध्यापक
कम्पोजिट विद्यालय शिवाल मठिया
बैरिया, बलिया

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