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संगीत में बलिया के लाल ने भरी कॅरियर की उड़ान, इस गाने ने बनाया था पॉपुलर

बलिया। रामचरित मानस और श्रीमद्भागवत को अपनी सुमधुर आवाज देने वाले कलमेश हरिपुरी किसी पहचान के मोहताज नहीं हैं। गाजीपुर में लहंगा लुटल, ताजपुर डेहमा चुनरी... से भोजपुरी गायन की शुरुआत करने वाले कमलेश उपाध्याय 'हरिपुरी' के नाम आज कई रिकार्ड जुड़े हुए हैं। कभी अपने रोमांटिक भोजपुरी गाने से युवाओं के दिलों में खास स्थान रखने वाले हरिपुरी आज फ़िल्मी गीत व गजल के साथ-साथ अपने भजनों के जरिये लाखों श्रोताओं के दिलों पर राज कर रहे हैं। 


कविकुल शिरोमणि गोस्वामी तुलसीदास द्वारा विराजित रामचरितमानस को अखंड 36 घण्टे तक गायन करने का रिकार्ड यदि इनके नाम है तो श्रीमद्भागवत भागवत को भी अर्थ सहित प्रस्तुत कर कमलेश ने लाखों वैष्णव भक्तों को भी अपना मुरीद बना लिया है। भक्ति गीतों व भजन का यह कारवां यहीं नहीं रुकता। कबीर दास के दस हजार से अधिक दोहों को अपनी आवाज दे कर कमलेश ने निर्गुण भक्ति शाखा को भी पल्लवित करने का काम किया है।शायद यही कारण है कि महज दो दशक के सफर में ही हरिपुरी ने आधा दर्जन से अधिक अवार्ड अपने नाम कर लिया है। 


फिलहाल मुंबई में रहकर भोजपुरी गीत संगीत के साथ-साथ भक्तिमाला कि कड़ियां जोड़ने में जुटे हरिपुरी ने purvanchal24.com से बातचीत में भोजपुरी को लेकर चिंता भी जाहिर की। पंडित पुरुषोत्तम दास जलोटा (अनूप जलोटा के पिता) से  संगीत की बारीकियां सीखने वाले कमलेश हरिपुरी भोजपुरी को अश्लीलता से बचाने के पक्षधर हैं। कहा कि भोजपुरी में वो ताकत है कि बिना अश्लीलता के भी इशारों में सब कुछ समझा देती है। पर कभी अपनी मिठास और भावात्मक पकड़ से श्रोताओं को अंदर तक झकझोरने वाली बोली आज अश्लीलता का केंद्र बन गई है। दोअर्थी गानों के प्रचलन ने तो मानो इसका बेड़ा ही गर्क कर दिया है। 

स्वच्छ भोजपुरी-स्वस्थ भोजपुरी के पक्षधर हैं कमलेश

अनौपचारिक मुलाकात में अपनी संगीत यात्रा को बयां करते हुए कमलेश ने कहा कि एक छोटे से गांव के ब्राह्मण परिवार से सम्बन्ध है। मेरे परिवार में संगीत से दूर-दूर तक किसी का वास्ता नहीं था, पर बचपन से ही मेरा झुकाव संगीत के प्रति रहा। पढ़ाई छोड़कर अपने साथियों संग घर के वर्तनो संग जो रिश्ता जोड़ा वह आज संगीत के साथ अटूट हो गया है। स्कूली दिनों में गुरुजनों से जो प्यार, सहयोग व उत्साहवर्धन हुआ उसीका नतीजा है कि आज मैं इस मुकाम तक पहुंचा हूं।

हरिपुरी उप नाम जोड़ने का कारण

एक सवाल के जबाब में कमलेश ने कहा, जब मैं मिडिल में था तो मेरी चचेरी बहन की शादी थी। कार्ड छपवाने का जिम्मा मुझे मिल गया। इसी समय मैंने सोचा कि क्यो न मैं अपने नाम के साथ गांव का नाम भी जोड़कर अपना नाम कमलेश हरिपुरी कर लूं। फिर क्या था, मैंने कार्ड में अपना नाम कमलेश हरिपुरी लिखवा दिया। अब यह मेरी पहचान बन गया है। मेरा गांव भी आज कमलेश हरिपुरी के गांव के नाम से जनपद व देश में मशहूर है। कहा कि मुझे खुशी और गर्व है कि मेरे मुम्बई जाने के बाद भी मेरे बड़े भाईया कन्हैया हरिपुरी (लोकगीत गायक) और मेरे छोटा भाई राकेश हरिपुरी (तबला वादक) ने इसे जीवंत रखा है।

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