To Learn Online Click here Your Diksha Education Channel...


ads booking by purvanchal24@gmail.com

जनऊबाबा साहित्यिक संस्था 'निर्झर' के संयोजक के शब्दों में मां


मां ममता की सागर होती है
भारतीय संस्कृति से मां शब्द में एक ऐसा अपनापन है, जिसमें ममता की गहराई है।वात्सल्य का ऐसा खजाना है, जो दुनिया में अन्यत्र कहीं नहीं मिल सकता। ना रिस्ता निभाने की औपचारिकता, न भावनाओं का लेखा जोखा, सीधा सम्बन्ध होता है बच्चों को अपनी मां के साथ। मां भगवान की दूसरी रूप होती है। हर मां अपने विवेक के अनुसार अपनी संतान में ईमानदारी, साहस, निडरता, न्याय प्रियता व परिश्रम इत्यादि के बीज बचपन में ही बो देती है। बड़ा होने पर यही आदर्श उस बच्चे के व्यक्तित्व की पहचान बनते है। वर्तमान समय में घर का उचित रूप से काम-काज संभालने वाली नारी दोहरी जिम्मेदारी का निर्वहन कर रही है। अपने कुशल प्रबन्धन के चलते नारी इस भूमिका में अपनी सार्थकता को बेहतर तरीके से प्रमाणित करती है। कहा जाता है कि किसी भी व्यक्ति की प्रथम गुरु उसकी मां होती है। किसी व्यक्ति में जो भाव व संस्कार मां देती है, वह उसके संपूर्ण जीवन का महत्वपूर्ण आधार होती है। यह भाव ही व्यक्ति के जीवन की दशा तय करते है। मां ममता का सागर इसलिए होती है, क्योंकि मां की ममता सभी रुपों में झलकती है, तभी तो मां को ईश्वर के समान माना जाता है। मां अपने बच्चों के दुख देख भावुक हो जाती है और उसे दुख से निकालने के उपाय सुलझाने लगती है। मां का कभी भी किसी वस्तु के साथ मूल्य नहीं किया जा सकता है।

धनेश पाण्डेय
संयोजक
जनऊबाबा साहित्यिक संस्था 'निर्झर'
जनऊपुर, बलिया

Post a Comment

0 Comments