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बलिया की पाती का दिल्ली में सम्मान

नई दिल्ली। भाषा के तौर पर भोजपुरी का बखान सीमित पन्नों मे सहेजना संभव नहीं है। कबीर दास, दरिया साहेब या गोरखनाथ जैसे संतों की कृतियां कालजयी हैं। कहें तो इससे भी आगे सातवीं सदी से ही भोजपुरी, भाषा से आगे साहित्य की दर्जा ले चुकी थी। बाणभट्ट के साथी रचनाकारों में बेनिभारत और इशानचंद का नाम आना इसका प्रमाण है। तब से अब तक भोजपुरी के साहित्य में सदैव निरंतरता बनी रही। 


भोजपुरी को लेकर मौजूदा प्रयास को बल देने हेतु अतीत का जिरह जरूरी होता है, इसलिए ऊपर इसका संदर्भ लिया। अब सवाल है कि मौजूदा प्रयास क्या है? एक प्रयास है, इसे राष्ट्रीय भाषाओं की सूची में स्थान मिले और दूसरा साहित्य समृद्ध हो और इन्हीं मकसद को पाने के खातिर एयरपोर्ट अथिरिटी अधिकारी सभागार सफदरजंग दिल्ली में विश्व भोजपुरी सम्मेलन और भोजपुरी समाज दिल्ली ने भोजपुरी पत्रिका 'पाती' को उसके सौवें अंक के प्रकाशन पर सराहने के लिए सभा का आयोजन किया। सभा की अध्यक्षता अजीत दुबे ने किया। इसमें 'पाती' के संपादक डा. अशोक द्विवेदी समेत भोजपुरी साहित्य, संस्कृति और कला से जुड़े नामचीन लोग शरीक हुए। 


भोजपुरी दिशा बोध की पत्रिका है 'पाती', जो उत्तर प्रदेश में आर्थिक पिछ्डेपन के शिकार जनपद बलिया से निकलती है। इससे आप अंदाजा लगा सकते हैं कि यह पत्रिका अपने सौवें सीढ़ी चढ़ने में कितना दम भरी होगी। पर बलिया यूं ही बागी नहीं कहा गया। अड गए तो लड़ गए। 

इस हेतु डा. अशोक द्विवेदी और उनके सहयोगियों की जितनी भी प्रसंशा किया जाय कम है। भोजपुरी को समृद्ध करने में उनके योगदान को हम भूलेंगे नहीं। सभा में वक्ताओं ने अजीत दुबे के प्रयासों को लेकर विशेष तौर पर ध्यान खिंचा। भोजपुरी को मान्यता दिलाने के लिए अजीत दुबे के संघर्ष को आंदोलन के रूप में चित्रित किया। यही नहीं, अकेले दम पर एक उदेश्य को कैसे विस्तार दिया जा सकता है, यह भोजपुरी के संदर्भ में अजीत दुबे के प्रयत्न में दिखता है।


वरिष्ठ पत्रकार भरत चतुर्वेदी की फेसबुक वाल से

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