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फर्श से अर्श छूने की नजीर पेश कर रहा बलिया का यह सरकारी स्कूल, पढ़िएं शिक्षक के लगन की कहानी

बलिया। यह दास्तां उस शिक्षक की शिद्दत और आत्मीय सरोकार की है, जिसने बंद स्कूल को हौंसलों की उड़ान से सफलता की आसमां तक पहुंचा दिया है। नगर शिक्षा क्षेत्र के वजीरापुरा में स्थित चित्तू पांडेय प्राथमिक विद्यालय आज फर्श से अर्श छूने की नजीर पेश कर रहा है। बेसिक शिक्षा विभाग में यह मिसाल कायम की है शिक्षक डॉ. सुनील कुमार गुप्ता ने। 

2011 में  डॉ. सुनील कुमार गुप्ता की तैनाती इस विद्यालय पर बतौर सहायक अध्यापक हुई थी, तब विद्यालय पूरी तरह बंद था। स्कूल की दीवारें जर्जर थी। पेड़-पौधे या फिर बाउंड्रीवाल की बात करना तो बेमानी जैसा था। बावजूद इसके डॉ. सुनील कुमार गुप्ता ने कर्तव्य के प्रति ईमानदार सोच का परिचय दिया। स्कूल की साफ-सफाई खुद के हाथों करने के साथ ही ग्रामीणों से सम्पर्क कर उनका भरोसा जीतने की कोशिश की। शिक्षक को सफलता भी मिली और 06 बच्चों ने प्रवेश कराया। 

शिक्षक डॉ. सुनील कुमार गुप्ता ने सिर्फ 11 साल में इस स्कूल को फर्श से अर्श तक पहुंचा दिया है। 06 छात्र संख्या वाले इस स्कूल में अब 155 बच्चों का भविष्य गढ़ा जा रहा है। यही नहीं, आज यह स्कूल मिशन प्रेरणा लक्ष्य को भी साकार कर रहा है। विद्यालय पर इकलौता शिक्षक होने के बाद भी यहां की शिक्षा व्यवस्था प्रेरणाश्रोत है। 

2011 में शुरू हुई डॉ. सुनील की मुहिम

प्रधानाध्यापक डॉ. सुनील कुमार गुप्ता वर्ष 2011 में इस स्कूल पर सहायक अध्यापक बनकर पहुंचे थे, तब विद्यालय बंद था। डॉ. सुनील कुमार गुप्ता ने बंद स्कूल को बचाने की मुहिम शुरू की। वह बताते हैं कि शुरुआत में घर-घर जाकर अभिभावकों को समझाया। 6 बच्चे प्रवेश लेकर स्कूल आने लगे तो फिर आसपास के दूसरे लोगों को भी बच्चों को स्कूल भेजने के लिए जागरूक किया गया। वक्त के साथ संख्या बढ़ती गई और अब यहां 155 बच्चे पढ़ने आते हैं।कुछ समय पहले शिक्षा विभाग ने डॉ. सुनील को यहां से हटाने का प्रयास किया था, लेकिन तीखे विरोध के बाद प्रयास असफल साबित हुआ। 

पेड़-पौधे और झाड़ियां दे रही खुशहाली का संदेश

शिक्षक डॉ. सुनील अन्य शिक्षकों के लिए प्रेरणास्रोत हैं। उन्होंने बहुत मेहनत की है। इन्होंने अपने प्रयासों से न सिर्फ इस स्कूल को मुकाम तक पहुंचाया है, बल्कि विद्यालय को प्राकृतिक श्रृंगार भी किया है। 2011 तक खंडहरनुमा दिखने वाले इस विद्यालय में आज 20 बड़े पेड़ है। विभिन्न प्रजातियों के फूल और क्यारियों में लगी झाड़ियां, काफी लुभावनी है। बतौर डॉ. सुनील वे नियमित यानी छुट्टी के दिन भी स्कूल जाकर पेड़-पौधों की सिंचाई करते है। 

उपचारात्मक शिक्षा से संवर रहा बचपन

डॉ. सुनील बताते है कि इस विद्यालय पर सिर्फ उनकी ही तैनाती है, जबकि कक्षाएं पांच और कक्ष तीन है। ऐसे में मिशन प्रेरणा लक्ष्य को ध्यान में रखकर बच्चों को उनकी जानकारी के हिसाब से स्तरीकरण तीन भागों में कर दिये है। तीनों स्तर के बच्चे अपने-अपने ग्रुप के साथ तीनों कक्षों में बैठते है। तीनों कक्षों में बच्चों की पढ़ाई सुचारू चलती है। सुबह-शाम असेम्बली होती है, जिसमें सामान्य ज्ञान, योगाभ्यास के साथ ही मुख्य समाचार से भी अवगत कराया जाता है। यहां उपचारात्मक शिक्षण पर भी जोर रहता है, ताकि बच्चों का भविष्य संवरे। 

बच्चे ही नहीं, अभिभावकों का नाम भी जुबां पर

प्रधानाध्यापक डॉ. सुनील बताते है कि उन्हें न सिर्फ अपने विद्यालय में नामाकित हर बच्चों का, बल्कि उनके माता-पिता का भी नाम उनकी जुबां पर है। वे बच्चों की पढ़ाई का फीडबैक भी अभिभावकों से मिलकर लेते रहते है। 

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