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दोनों मंजरों में अन्तर बस सिन्दूर का था...

विदाई

विदाई के वक्त...
वो बांध रही थी बाल
एक तरफ किया बचपन का अल्हड़पन
दूसरी तरफ वैवाहिक जीवन का धर्म
दोनों मंजरों में अन्तर बस सिन्दूर का था!

विदाई के वक्त...
वो सहेज रही थी 
अपनी जरूरत का सारा सामान
और आलमारी में समेट कर रख दिये अपने पंख...
जो कि सबसे जरूरी सामान था!

विदाई के वक्त ...
वो उछाल रही थी
भर -भर अंजुलि चावल
और भर रही थी आंख और मन!

विदाई के वक्त
वो जोड़ रही थी गांठ तन की
पति के साथ
रुह को मां के आंचल से बिना छुड़ाए
एक बेटी!!
विदाई के वक्त 
कर रही थी देहरी पार!

शालिनी श्रीवास्तव, बलिया

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