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बस यूं ही...

बस यूं ही...

आने वाले कुछ वर्षो में भारत सरकार और प्रदेश सरकार के कुछ मंत्रालयों की संख्या क्या वास्तव में और कम हो जाएगी अथवा शनैः-शनैः पूर्णतः समाप्त कर दी जाएगी। ऐसा विचार इस लिए आ रहा है, क्योंकि भारत सरकार के विगत सात वर्षों का कार्यकाल और उत्तर प्रदेश के पांच वर्षो के कार्यकाल की अगर एक समान्य नागरिक की तरह शालीनता पूर्वक समीक्षा की जाए तो शायद आपको भी ऐसा ही महसूस हो।

जैसे केंद्र सरकार में विगत की सरकारों में कुछ मंत्रालयों की अपनी एक अलग और खास पहचान हुआ करती थी और पहचान बनाने में उस मंत्रालय के मंत्री का अनुभव और कार्यपद्धति बहुत ही महत्त्वपूर्ण होता था। और यही अनुभव और कार्य की विशिष्टता या प्रसिद्धि उन्हें सामाजिक अथवा राजनैतिक  जीवन में आगे लेकर जाती थी। विशेषकर विदेश मंत्रालय, मानव संसाधन, रेल, संचार, वाणिज्य, ऊर्जा, गृह और रक्षा मंत्रालय।

आम जनता का रुझान प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री के शपथ ग्रहण के साथ ही इन मंत्रालयों के लिए चयनित होने वाले व्यक्तित्व और व्यक्तियों को लेकर भी अपने चरम पर होता था। ज्यादातर इन महत्वपूर्ण मंत्रालयों पर  अनुभवी, योग्य, कद्दावर ,लोकप्रिय और परिश्रमी नेताओ को ही काविज किया जाता था। मंत्रियों की अपनी सोच और  काम करने के अपने तरीके की पद्धति स्पष्ट दृष्टिगोचर हो जाती थी।         

लेकिन वर्तमान समय में ऐसा लग रहा है कि ये मंत्रालय और मंत्री केवल नाम भर के रह गए है। क्योंकि अब किसी भी मंत्रालय पर काविज मंत्रियों के स्वरचनात्मकता की झलक कंही दिखाई ही नहीं दे रही है। लगभग सभी मंत्रालय सामुहिक से प्रतीत होने लगे हैं क्योंकि इन से संबंधित मंत्रियों के पास ना तो कोइ अपनी नीति रह गई है और ना ही उसका क्रियान्वयन।

आज अगर प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे नौजवानों से भी अचानक इन मंत्रालय के मंत्रियों के नाम और इनके उल्लेखनीय कार्य पूछ दिए जाएं तो आप उनको भी निरुत्तर ही पाएंगे। अगर ये मंत्री कभी-कभी सदन में और यदा-कदा  जनता के बीच मे भी बोलते है तो यही बोलते है कि- आदरणीय, प्रात स्मरणीय, हमारे भाग्यविधाता, विश्व के सबसे लोकप्रिय नेता, प्रधान मंत्री जी की प्रेरणा या उनके निर्देश से ये कार्य सम्पन्न  हुआ है। ये कभी नहीं बोल पाते कि मेरा भी यह सपना था जिससे मुझे सेवा का ये अवसर मिला, या अपने क्षेत्र, प्रदेश, देश की जनता से प्रेरणा या सीख मिली-अथवा मंत्री विशेष के रुप में मेरी भी अमुक उपलब्धि रही है। आखिर क्यों..?? मुद्दा विचारणीय है..!? 

जैसे एक छोटा सा उदाहरण मानव संसाधन या शिक्षा मंत्रालय का ही लें। देश को 34 वर्ष बाद नयी शिक्षा नीति मिली है। बहुत सारी खूबियां और दूरगामी सोच से भरी हुई है। पर क्या इससे संबंधित मंत्री और उनकी व्यक्तित्व विशिष्टता की झलक कंही आपको देखने को मिली... जैसे अर्जुन सिंह और मुरली मनोहर जोशी के कार्यालय में देखने को मिला करता था... शायद नहीं? 

देश के पांच प्रमुख राज्यों में अभी चुनाव सम्पन्न हुआ है। जिसमें सबसे बड़ा प्रदेश उत्तर प्रदेश भी है। पर क्या कहीं आपने सुना शिक्षा नीति के बारे किसी माननीय जी के मुंह से I माननीय राजनाथ सिंह जब उत्तर प्रदेश में शिक्षा मंत्री थे तब उन्होंने उत्तर प्रदेश के गिरते हुए शिक्षा-स्तर को एक नया आयाम दिया और पूरे प्रदेश में नकलविहिन परीक्षा कराकर ना सिर्फ शिक्षा की गुणवत्ता को सुधारा बल्कि भावी पीढ़ी के लिए उच्च शिक्षा के मानदंडों पर खरा उतरने योग्य बनाया। यह व्यक्तित्व विशिष्टता ही थी कि आगे चलकर उन्हें मुख्यमंत्री और केंद्र में महत्वपूर्ण विभाग में काविज होने का अवसर मिला। 

आज के शिक्षा मंत्री जी का काम क्या अब सिर्फ परीक्षा की तिथि ही घोषित करना रह गया है अथवा देश की शिक्षा व्यवस्था से संबंधित कोई रोडमैप भी है? आज केंद्रीय विश्वविद्यालयों में नामचीन कुलपतियों की कमी, प्रोफेसर और रीडर की अनुपलब्धता,  30 से 40 प्रतिशत सीटों का खाली रह जाना......  है कोई जबाबदेह!?! 

दूसरा उदाहरण विदेश मंत्रालय का है, जिसकी जिम्मेदारी कभी बाजपेयी जी, जसवंत सिंह, सुषमा स्वराज जैसे कद्दावर नेता संभालते थे I विदेश नीति प्रभावशाली तो दिखती ही थी और पड़ोसी देशों के साथ-साथ मजबूत राष्ट्रों से भी हमारे संबंध अच्छे थे। उनके काल विशेष की उपलब्धियों को इतिहास में हमेशा के लिए में उनके नाम से ही अंकित कर दिया जाता था लेकिन आज.........!? 

तीसरा उदाहरण संचार मंत्रालय का, आज भारत सरकार का सबसे बड़ा उपक्रम BSNL बिकने के कगार पर खड़ा है I जहां सभी डाटा ऑपरेटर कंपनियां  5G का दावा कर रही हैं वही BSNL अपनी 3G सेवा प्रदान करने में भी असमर्थ हैं।

रेल मंत्री के रूप में कार्य करते हुए जार्ज फर्नांडिस और श्री लालू प्रसाद यादव ने भी अपनी विशेष छाप छोड़ी। पर आज रेल मंत्री जी कौन हैं और क्या कार्य कर पा रहे हैं कभी सुर्खियों का हिस्सा नहीं बनता अब। कृषि मंत्रालय की चर्चा ना ही की जाय तो अच्छा है। 2022 तक किसानों की आय दुगुनी करने की कितनी दूरगामी सोच और योजनाएं बनाई गई। सरकार ने रोडमैप भी तैयार किए थे।किसानों को भरोसा भी हो गया था कि आने वाले दिनों में उनकी दशा सुधरेगी। लेकिन कृषि बिल की हड़बड़ी ने सारा खेल ही बिगाड़ दिया। निश्चित रूप से नीम कोटेड यूरिया से लेकर सिंचाई के संसाधन बढ़े लेकिन नतीजे से आज हम सब वाकिफ़ है....!? 

और यही हाल है उत्तर प्रदेश का...आज अगर साधारण जनता से सवाल पूछ लिया जाए कि...

एक्स्प्रेसवे कौन बनवाया-योगी जी ने! 
मेडिकल कॉलेज कौन बनवाया-मोदी और योगी जी ने!  
बुलडोजर कौन चलवाया- योगी जी ने!            गरीबों का आवास किसने बनवाया- मोदी जी
फ्री का राशन कौन बटवाया - मोदी जी   
फ्री का गैस cylinder किसने दिया- मोदी जी 

पिछले दिनों में कुछ महत्त्वपूर्ण मंत्रालयों का प्रभार नौकरशाहों को देना जैसे- विदेश, रेल, ऊर्जा, स्वास्थ्य... यह कहा तक जनहित में उपयोगी है? इसकी समीक्षा होनी चाहिए। ये लोग ना तो चुनाव में प्रचार कर सकते है ना ही पार्टी के कार्यकर्ताओं और आम जनता की मनसा समझ सकते है। जनता और गाँव में जाकर रात्रि प्रवास कर  जनता की समस्याओं को समझेगा कौन? 

तथाकथित अनेको ऐसे उदाहरण है जो विकास का सारा श्रेय सिर्फ प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री तक सीमित कर देते हैं औऱ ये गलत भी नहीं है। क्योंकि माननीय मंत्रीयों का अपने ऊपर से लगता है विश्वास उठ गया है तो माननीय मंत्री जी आप केवल मेज थपथपाने के लिए और राज्य सरकार की गाड़ी और सुरक्षा कर्मी लेकर प्रदेश परिक्रमा करने के लिए मंत्री बनाए गए हैं।

अच्छा वस्त्र पहनना कोई गलत बात नहीं है, लेकिन अपने वस्त्र के कारण अपनों से अलग हो जना गलत है। चन्द्रशेखर जी की तरह दाढ़ी रखने से कोई चन्द्रशेखर नहीं हों सकता। जोशी जी की तरह दुपट्टा रखने से कोई जोशी नहीं हो सकता। मोदी की तरह सदरी पहनने से कोई मोदी नहीं हो सकता... हां लेकिन उनको पढ़ने से, उनकी नितियों को समझने-बुझने से और जनता का दुख दर्द सुनने से,जनता से सीधा संवाद करने से सच्चाई को स्वीकार करने की आदत डालने से, अपने आचरण में नम्रता लाने से और चारो पहर यह याद रखने से कि आज इसी जनता की बदौलत हैं- आपका वजूद है।


डॉ. कुंवर अरूण सिंह की फेसबुकवाल से

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