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कर रही मैं मिन्नतें, कर लें मुहब्बत

काव्योदय

छोड़ कर अब नफरतें, कर लें मुहब्बत
है भली यह आदतें, कर लें मुहब्बत 

क्यूँ भटकता फिर रहा तन्हा यहां पर
देख मेरी हसरतें, कर लें मुहब्बत 

धड़कने यह कह रही, मैं बस में तेरे
रब तुझे हम मानते, कर लें मुहब्बत 

हों नज़ारें लाख चाहे इस चमन में
इक तुझे हम चाहते, कर लें मुहब्बत
 
काम सारे, नाम तेरे, क्यूँ यहां हैं
छोड़ सब मसरुफियतें, कर लें मुहब्बत

यह समय जो आज है, शायद न हो कल
कर रही मैं मिन्नतें, कर लें मुहब्बत 

रजनी टाटस्कर 

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