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बलिया बीएसए का 'आखिरी पत्ता'

आखिरी पत्ता

हां मैं भी बनना चाहता हूं 
वृक्ष का आखिरी पत्ता 
जैसे कोई इंसान बनता है 
अपने अंतिम समय का,
तमाम ख्वाहिशें हैं 
जो दिल में तड़प रही हैं
जीने की वजह बनकर
उन्हें समेटना चाहता हूं।
जीना चाहता हूं खुलकर 
जैसे परिंदे उड़ते हैं आसमान में
बिना डरे, बिना थके
अपनी ख्वाहिशों के साथ,
अपनी उम्मीदों को लेकर 
एक ऐसी जिंदगी जिसमें 
सारा जहां कैद हो,
हां लेकिन 
उस शेर के पिंजरे की तरह नहीं 
बल्कि एक स्वच्छंद 
जंगल में बने अभयारण्य की तरह।
हंसना चाहता हूं खुलकर
अपनी सारी उम्मीदों को लेकर 
इस खुले आसमान के नीचे 
बिखेर देना चाहता हूं 
अपने सारे खिलौने,
बसाना चाहता हूं 
अपनी एक हकीकत की दुनिया 
और बनना चाहता हूं 
वृक्ष का आखिरी पत्ता।

साभार: 
शिव नारायण सिंह "शान"
बलिया बीएसए की फेसबुकवाल से

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