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बलिया की इस हालात से चिंतित पर्यावरणविद्व ने दिया यह सुझाव, ताकि...

बलिया। वर्तमान दौर कोरोना वायरस संक्रमण से उत्पन्न महामारी के कारण तीसरी लहर के रूप में दिखाई देने लगा है। कोरोना वायरस का ओमीक्रोन वैरियन्ट जिस तेजी से पांव पसार रहा है, उसको देखते हुए ऐसा लग रहा है कि तीसरी लहर का प्रकोप आ रहा है और भारत सहित सम्पूर्ण विश्व संकट के दौर से गुजर रहा है। ऐसे में पहली एवं दूसरी लहर के संकट को ध्यान में रखते हुए लोगों के अन्दर आक्सीजन के कमी की संकट की बात भी झकझोरने लगी है।

पर्यावरणविद्व डॉ. गणेश पाठक कहते है कि हम यह भी देख चुके हैं कि जो क्षेत्र प्रकृति से भरपूर रूप से जुड़े रहे, उन क्षेत्रों में कोरोना का प्रकोप भी कम रहा है। आक्सीजन भी प्राकृतिक रूप से भरपूर मिलता रहा, जिससे ऐसे क्षेत्रों में संक्रमण अधिक नहीं बढ़ पाया। अब जबकि तीसरी लहर की आहट हमें स्पष्टतया दिखाई देने लगी है, हमें भी ऐसे पेड़-पौधों की याद आने लगी है, जिनसे हमें पर्याप्त आक्सीजन प्राकृतिक रूप से मिलता रहे और ये पौधे प्राकृतिक रूप से वायु का शोधन कर वायु को शुद्ध बनाए रखें।

वास्तव में हमने अपने स्वार्थवश पेड़-पौधों का सफाया कर दिया और आज हमें कृत्रिम आक्सीजन तैयार करना पड़ रहा है। जान बचाने के लिए आक्सीजन को खरीदना पड़ रहा है, फिर जान नहीं बच रही है। अब से भी हमें चेतना होगा, हमें प्रकृति की भरपाई पेड़-पौधौं को लगाकर करनी होगी। हमें आक्सीजन देने वाले पौधे पीपल, बरगद, पाकड़, नीम आदि को सर्वत्र लगाना होगा। सैकड़ों ऐसे छोटे पौधे आक्सीजन देने वाले हैं अथवा वायु को शुद्ध करने वाले हैं, जिनको हम गमले में भी लगाकर भरपूर आक्सीजन एवं शुद्ध हवा पा सकते हैं। ऐसे पौधों में अनेक प्रकार के पाम, मौलश्री, तुलसी, दवना मड़ुवा, एलोवेरा, करीपत्ता, अनार,सर्पेंटाइल, अश्वगंधा, कनैला, लेमनग्रास, नीबू सहित अनेक पौधे हैं, जिनको नगरों में भी गमले में लगाया जा सकता है। 

जहां तक बलिया की बात है तो यहां कुल भूमि का एक प्रतिशत भी वृक्ष नहीं हैं, जबकि पारिस्थितिकी को संतुलित बनाए रखने हेतु तैंतीस प्रतिशत भूमि पर वनों का होना आवश्यक है। अगर अभी से भी नहीं चेते तो वर्तमान को देखते हुए हम कह सकते हैं कि भविष्य बहुत अंधकारमय दिख रहा है। यदि वन वृक्ष नहीं तो जल एवं वायु नहीं और जल तथा वायु नहीं तो जीवन नहीं।

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