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'उसे' ढूंढकर थक चुके बलिया के पत्रकार ने कुछ यूं पूछा 'कहां ठहरे हो'


कहां ठहरे हो...
दरवाजे पर लगी घंटी का बटन दबाते हुए तमाम खयाल मन में आ रहे थे। खुशी थी, जो चेहरे पर आकर बैठ गयी थी। हो भी क्यों नहीं, लंबे अंतराल के बाद जिगरी यार से जो मिलना था। खयालों में डूबे थे, तब तक दरवाजा खुला। उम्मीद के मुताबिक दोस्त ने ही दरवाजा खोला। सामने देखते ही पहला सवाल था- अरे तुम? फिर उसने भी खुशी जाहिर करते हुए अंदर आने के लिए हाथों से इशारा किया। जब तक हम लोग बैठते, पहला सवाल था- कहां ठहरे हो? मैंने बताया स्टेशन के पास एक होटल में। इतना कहकर मैं उसके अगले शब्दों का इंतजार करता रहा। एक बार भी कह दे, झूठ में ही सही, अपना घर शहर में है, तो होटल में क्यों रहोगे।
मुझे लगता है कि हमारी संस्कृति का सबसे ज्यादा नाश होटलों ने किया है। या ये भी हो सकता है कि हमारी टूटती संस्कृति ने ही होटल व्यवसाय को बढ़ावा दिया हो। मेरे खयाल से किसी शहर में आलीशान और लग्जरियस होटलों की भरमार वहां की आर्थिक संपन्नता की पहचान हो सकती है, तो सांस्कृतिक विपन्नता की निशानी भी है। दो दशक पहले तक हम घर से निकलकर किसी शहर में जाते थे, तो परिचितों की लिस्ट बनाते थे। रहने और खाने के लिए तब होटल बुक कराने की जरूरत नहीं पड़ती। 
90 के दशक तक होटल संस्कृति हमारी संस्कृति और संस्कारों पर भारी नहीं पड़ी थी। हम अपनों की तलाश में रहते थे। दो दिन का कार्यक्रम बनाकर कहीं गये, तो चार दिन बेफिक्र होकर ठहर जाते थे। तब संचार सेवा इतना आम नहीं थी। अचानक दरवाजे पर दस्तक देते तो सामने वाले के चेहरे की खुशी देखने लायक होती। फिर शहर की खाक छानने में कई बार यह भी भूल जाते कि किस काम से आये हैं। साल- दो साल पर इसी बहाने रिश्तों का रिन्यूवल भी हो जाता था।
अभी पिछले दिनों एक शहर में जाना हुआ, तो इसी हड़बड़ी में रहे कि काम खत्म हो और वापसी का टिकट कटायें। हुआ भी ऐसा ही। पहले से ज्यादा लोग शहर में थे। संचार की सुविधा भी थी। लेकिन मन मारकर अपनों के उस पराए शहर को कुछ घंटों में ही अलविदा कह दिया। फिर मुझे करीब एक दशक पहले कहीं पढ़ा हुआ एक शेर याद आया...
जगमगाते शहर की रानाइयों में क्या न था, 
ढूंढने निकला था जिसको बस वही चेहरा न था,
हम वही, तुम भी वही, मौसम वही, मंज़र वही, 
फासले बढ़ जायेंगे, मैंने कभी सोचा न था।

धनंजय पांडेय पत्रकार

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