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देव शिल्पी भगवान विश्वकर्मा पूजा पर विशेष, देखें शुभ योग


ओम् आधार शक्तपे नम: और ओम् कूमयि नम:, ओम् अनन्तम नम:, पृथिव्यै नम:

भारत के कुछ भाग में यह मान्यता है कि अश्विन मास के प्रतिपदा को विश्वकर्मा जी का जन्म हुआ था, लेकिन आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि लगभग सभी मान्यताओं के अनुसार यही एक ऐसा पूजन है जो सूर्य के पारगमन के आधार पर तय होता है। भगवान विश्वकर्मा को देव शिल्पी कहा जाता है। उन्होंने सतयुग में स्वर्गलोक, त्रेतायुग में लंका, द्वापर में द्वारका और कलियुग में जगन्नाथ मंदिर की विशाल मूर्तियों का निर्माण किया है। ऋगवेद में इनके महत्व का वर्णन 11 ऋचाएं लिखकर किया गया है। 17 सितंबर को विश्वकर्मा जयंति पर शुभ मुहूर्त में किया गया पूजन कारोबार में इजाफा करने के साथ ही आपको धनवान भी बना सकता है।

स्कंद पुराण के अंतर्गत विश्वकर्मा भगवान का परिचय 
“बृहस्पते भगिनी भुवना ब्रह्मवादिनी प्रभासस्य तस्य भार्या बसूनामष्टमस्य च विश्वकर्मा सुतस्तस्यशिल्पकर्ता प्रजापति” 

श्लोक के जरिए मिलता है। इस श्लोक का अर्थ है महर्षि अंगिरा के ज्येष्ठ पुत्र बृहस्पति की बहन भुवना ब्रह्मविद्या की जानकार थीं। उनका विवाह आठवें वसु महर्षि प्रभास के साथ संपन्न हुआ था। विश्वकर्मा इन दोनों की ही संतान थे। विश्वकर्मा भगवान को सभी शिल्पकारों और रचनाकारों का भी इष्ट देव माना जाता है। भगवान विश्वकर्मा के आविष्कार एवं निर्माण कोर्यों के सन्दर्भ में इन्द्रपुरी, यमपुरी, वरुणपुरी, कुबेरपुरी, पाण्डवपुरी, सुदामापुरी, शिवमण्डलपुरी आदि का निर्माण इनके द्वारा किया गया है। पुष्पक विमान का निर्माण तथा सभी देवों के भवन और उनके दैनिक उपयोगी होनेवाले वस्तुएं भी इनके द्वारा ही बनाया गया है। कर्ण का कुण्डल, विष्णु भगवान का सुदर्शन चक्र, शंकर भगवान का त्रिशुल और यमराज का कालदण्ड इत्यादि वस्तुओं का निर्माण भगवान विश्वकर्मा ने ही किया है।
17 सितंबर- शुक्रवार सुबह 6:07 बजे से.
18 सितंबर- शनिवार को 3:36 बजे तक

पूजन
केवल राहुकल के समय पूजा निषिद्ध
17 सितंबर- राहुकाल सुबह 10:50 बजे से दोपहर 12.21 बजे तक। बाकी समय पूजा का योग रहेगा।
इन सभी योगों में भगवान विश्वकर्मा की पूजा करने से कई गुना लाभ प्राप्त होगा।
भगवान विश्वकर्मा की पूजा विधि-विधान से करने पर विशेष फल प्रदान करती है. सबसे पहले पूजा के लिए जरूरी सामग्री जैसे अक्षत, फूल, चंदन, धूप, अगरबत्ती, दही, रोली, सुपारी, रक्षा सूत्र, मिठाई, फल आदि की व्यवस्था कर लें. इसके बाद फैक्ट्री, वर्कशॉप, ऑफिस, दुकान आदि के स्वामी को स्नान करके सपत्नीक पूजा के आसन पर बैठना चाहिए. कलश को स्थापित करें और फिर विधि—विधान से क्रमानुसार या फिर अपने पंडितजी के माध्यम से पूजा करें। पूजा धैर्यपूर्वक करें और सम्पन्न होने के बाद अपने ऑफिस, दुकान या फैक्टरी के साथियों व परिवार के साथ प्रसाद ग्रहण करने के बाद ही पूजा स्थान को छोड़ें।
भगवान विश्वकर्मा की पूजा हर व्यक्ति को करनी चाहिए। सहज भाषा में कहा जाए कि सम्पूर्ण सृष्टि में जो भी कर्म सृजनात्मक है, जिन कर्मो से जीव का जीवन संचालित होता है. उन सभी के मूल में विश्वकर्मा है। अतः उनका पूजन जहां प्रत्येक व्यक्ति को प्राकृतिक ऊर्जा देता है वहीं कार्य में आने वाली सभी अड़चनों को खत्म करता है।

ज्योतिष सेवा केन्द्र
ज्योतिषाचार्य पंडित अतुल शास्त्री
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