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वैश्विक महामारी एवं आधुनिक युवा पीढ़ी : पढ़ें बलिया के असिस्टेन्ट प्रोफेसर डॉ. मनजीत सिंह की रिपोर्ट


समाज की धुरी कही जाने वाली आधुनिक पीढ़ी निःसंदेह खतरे में हैं। इसका सबसे बड़ा कारण-यह वैश्विक महामारी ही है। इसे समझने के लिए निम्न बिंदुओं पर चरणबद्ध तरीके से प्रकाश डाला जा सकता है...
1. प्रारम्भ 
2. मध्य-चरम  
3. अंत 

सर्वविदित है विगत 18 मार्च से युवा सहित समस्त जनता चहारदीवारी में कैद हैं। उनके जीवन में न कुछ नया हुआ और न ही पुराने ने चोला बदला अपितु वे बावड़ी में ही घूमते रहे। आइए इसके तह की पड़ताल करते हैं-सबसे पहले ऐसी विषम परिस्थितियों में मनोरंजन के समस्त साधन विद्युत संचालित माध्यम तक सीमित हो गये। न कहीं घूमना, न कहीं खेलना और न ही स्कूल-कालेज का मुंह देखना। स्कूल-कालेज केवल शिक्षा के केंद्र ही नहीं होते अपितु ये किसी भी युवा के चतुर्दिक विकास में अपना योगदान भी देते हैं। यदि कोई छात्र पढ़ने में कमजोर है तो उसे खेल-खेल में भविष्य निर्माण की सहूलियत वहीं मिलती हैं। इससे सामाजिक-आर्थिक और अंततः सांस्कृतिक पृष्ठभूमि निर्मित होती है। 

भारतीय समाज में एकल होते परिवार की संरचना ने भी इस वैश्विक महामारी से प्रभावित होते युवाओं को विचलित ही किया। इस दौरान शहर से गांव की ओर पलायन होते परिवार एकल मानसिकता के कारण अभिशप्त रहे, जबकि यह बहुत अच्छा मौका था कि-कम से कह लोग अपनी नयी पीढ़ी को बचा सकते थे। यह स्थिति वैश्विक महामारी के प्रथम चरण को चरितार्थ करती है।

वैश्विक महामारी का द्वितीय चरण कथित मध्यांतर या चरम के रूप में अभिहित किया जा सकता है। इस चरण में हम को-रोना के भय से भ्रमित रहे। अपनी जान हर व्यक्ति को प्यारी होती है। इस समय हम छूआछूत से बचते हुए एक दूसरे से अधिक दूर होते गये। सरकार की नीतियां भी इसमें कमोबेश प्रभावी रही। इसी बीच अंतरजाल के भंवर में युवा पीढ़ी फंसने को मजबूर हुई। यह स्थिति उन्हें अपनों से पूर्णतः आजाद कर दी। किसान-मजदूर से लेकर बड़े-बड़े आतताइयों को पीढ़ी-सुधार के निमित्त समर्पण करना पड़ा। सबसे बड़ी बात तो यही रही कि इसका दुष्परिणाम भी लोगों की समझ से परे नहीं था। लेकिन वे मजबूर थे। 
इस भयावह महामारी ने अंतिम रूप में हमारी एक पीढ़ी को दूषित कर दिया। इसमें कोई संदेह नहीं कि धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष जैसे संस्कार व्यक्ति सापेक्ष हो सकते हैं, परन्तु युवा वर्ग में आये नैतिक पतन ने संस्कृत समस्त सभ्यताओं को दूषित कर दिया । इसकी प्रमाणिकता स्वतः सिद्ध है क्योंकि इससे प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप में कमोबेश सभी परिवार ग्रस्त हैं।

उदाहरण के लिए हम 20वीं सदी के अंतिम दशक का स्मरण कर सकते हैं । उस समय भी छात्रों को दो तरह की सुविधाएँ प्रदान की जाती थी। इनमें कुछेक वास्तव में अभावग्रस्त होते थे। उनके परिवार में फीस का जुगाड़ तो येन-केन प्रकारेण हो जाता था, लेकिन किताबों के निमित्त वे दूसरों पर आश्रित रहते थे। या उत्तराधिकार में प्राप्त किताबें ही सहारा बनती थी। जबकि उस समय भी कुछ छात्र सर्वसुविधासम्पन्न जीवन व्यतीत करते थे। उन्हें कापी-किताब से लेकर फीस तक की कोई समस्या नहीं थी, लेकिन उनका जीवन आज की युवा पीढ़ी से भिन्न था, क्योंकि उस समय माता-पिता या अभिभावक बहुत कड़े स्वभाव के होते थे और अपने बच्चों को अगली पंक्ति में देखना चाहते थे। इस कारण उस समय छात्रों में खाई कम थी। जब कोई छात्र घर से बाहर जाता था तो उसे अनेक समस्याओं से जूझना पड़ता था। इन्हीं समस्याओं के बीच से वह अपना रास्ता ढूढ़ निकलता था। कुल मिलाकर कुछ हद तक सन्तुलन बरक़रार रहा। परन्तु 21वीं सदी ने बहुत कुछ  पीढ़ी को परिवर्तित कर दिया।
इस प्रकार इस सदी के तीसरे दशक के अंतिम चरण में आयी इस महामारी ने सब कुछ बदल दिया। लोग अन्न-जल से कल को भोगने की बात कर रहे हैं, लेकिन उन्हें अपनी पीढ़ी में हुए बदलाव अनजाना लग रहा है। यह बदलाव दूरगामी प्रभाव डालेगा, जिसकी कल्पना से रोइह कांप जाता है। कहने का आशय यही है कि आधुनिक युवा आत्मनिर्भर नहीं है। वह स्वयं को नियंता मानकर घर-परिवार के साथ समाज को भी दूषित कर रही है। यह एक सार्वभौमिक सिद्धान्त बन चुका है।

अतः समाज के नवीन सुधारकों को उक्त परिवर्तित हुई व्यवस्था पर चिंतन जरूरी है। हम अपनी अर्थव्यवस्था सुधारने के लिए अधिक निवेश कर सकते हैं, हम अपना शरीर सुधारने के लिए संतुलित आहार और विहार कर सकते हैं, हम अपनी जीविका सुधारने के लिए मजदूरी कर सकते हैं लेकिन अपनी पीढ़ी सुधारने के लिए सरकारी व्यवसाय नहीं चालू कर सकते हैं। अपितु स्वयं ही उसके लिए प्रयोग बन सकते हैं । इसे सुधारने के लिए संयुक्त परिवार का फार्मूला कारगर साबित हो सकता है। साथ ही प्रेम और सौहार्द के माध्यम से भी कुछ अंतर दिखायी दे सकता है। लेकिन क्रांति दूत बनी युवा पीढ़ी प्रेम को भी घृणा के नजरिये से देखने को अभ्यस्त है। वह भी यदि पारिवारिक प्रेम हो तो स्थिति अधिक भयावह हो सकती है। इस कारण प्रेम के साथ थोड़ी कर्कशता भी जरूरी है।

अंततः यह कहने में तनिक भी संकोच नहीं है कि युवाओं की संवृद्धि ही देश की संवृद्धि है। कहते हैं-भारत युवाओं का देश है। जिस देश में युवाओं की जनसंख्या अधिक हो, उस देश के युवा अपने मार्ग से भटक जाय तो विकास के बहाने विनाश निश्चित है। अतः युवाओं के भविष्य को सुनिश्चित करना अत्यंत आवश्यक है।

© डॉ. मनजीत सिंह
असिस्टेन्ट प्रोफेसर हिन्दी विभाग
कुंवर सिंह पीजी कालेज बलिया

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