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बैरिया बलिदान दिवस : आओं मिलकर बनाएं शहीदों की सोच को सार्थक


ये कैसी आजादी। जहां हाय तौबा चीख चीत्कार का माहौल हो। ऐसे में आजादी का जश्न कैसे मने ? यह सबसे बड़ा यक्ष प्रश्न है। एक तरफ गंगा ने रौद्र रूप धारण कर कटान रूपी त्रासदी से लोगों को तिल तिल मरने पर मजबूर किया है। वही घाघरा ने भी अपना तांडव जारी रखा है। ऐसे में कटान, बाढ़ की विभीषिका, टूटे सड़क, बिजली की बदइंजामी, कोरोना के अलावा ऊपर से नफरत भरी विष घुली राजनीति कोढ़ में खाज साबित हो रही है। ऐसे में दुखी मन से शहीदों को श्रद्धा सुमन अर्पित करना आखिर यह दोष किसका और जिम्मेदारी किसकी ? आज यह तय करने का दिन है। इसे तय करने के लिए सबको जाति धर्म से उपर उठ कर आना पड़ेगा।
भारत माता को आजाद कराने व गुलामी की जंजीर तोड़ने के लिए द्वाबा के अमर शहीदों ने आजाद वतन का सपना संजोये सीने पर गोली खाया। देश को आजाद करा कर स्वतंत्रता दी। लेकिन उनके सपनों के अनुरूप मिलने वाली आजादी का मकसद ही आज भटक गया है। विष घूली राजनीति, टूटी सड़कें, स्वास्थ्य सेवा बदहाल, बिजली की बदइंतजामी, शिक्षा व्यवस्था गड़बड़, कोरोना महामारी से भी भंयकर जातीयता की राजनीति आदि समस्याएं समाज को मकड़जाल की तरह घेरे हुए हैं। बावजूद इसके कोई भी आगे आकर इन समस्याओं के समूल खात्मा के लिए सार्थक प्रयास नहीं कर पा रहा है। आखिर यह समाज कैसे चलेगा ? इसकी जिम्मेदारी कौन लेगा ? आजाद वतन का सपना संजोये सीने पर गोली खाकर अमर शहीद होने वाले शहीदों की आत्मा आज कचोटती होगी कि आखिर हमारे वंशज आजाद वतन की सार्थकता में क्या कर रहे हैं। अगर उनकी आत्मा आज के जिम्मेदारों से सवाल पर सवाल करना शुरू कर दें तो किसी के पास कोई जवाब नहीं है। लेकिन अमर शहीदों की आत्माओं के सवाल का जवाब देना ही पड़ेगा। क्योंकि बगैर जवाब इस सृजनात्मक समाज का संचालन होने वाला नहीं है। इसके लिए सभी जिम्मेदारो को भेदभाव छोड़ कर समाज में आगे आना होगा, और सब को एक सूत्र में बांधकर समाज का नवसृजन करते हुए समाज को बेहतर ढंग से संचालित करने के लिए लोगो को प्रेरित कर आगे बढ़ाना होगा। जब समाज मजबूत होगा तो राष्ट्र अपने आप मजबूत हो जायेगा।

शिवदयाल पाण्डेय 'मनन'
तहसील रिपोर्टर
बैरिया, बलिया

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