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बलिया में बाढ़ : अचके में खोतवा उजरी गइल, केकर नजर गड़ी गइल हो...

 


रामगढ़, बलिया। 'अचके में खोतवा उजरी गइल, केकर नजर गड़ी गइल हो...' भोजपुरी का ये मशहूर गीत उन गंगा कटान पीडितो पर सटीक बैठती है, जो अपने घर से बेघर हो जाते है। कटान का ये किस्सा कोई इसी साल का ही नहीं, वरन दो-तीन दशकों से चला आ रहा है। कहने को तो बैरिया विधानसभा क्षेत्र सियासत में बहुत रसूख रखता है, लेकिन गंगा कटान जैसी समस्या समाधान में फिसड्डी साबित हुआ है। केवल गंगा कटानरोधी कार्य में अब तक अरबो रुपये की खपत जरूर हुआ, लेकिन विभागीय भ्रष्टाचार ने एक बार फिर साबित कर दिया कि कटानरोधी कार्य के प्रति वे सदा उदासीन रहे है। बाढ़ व सिंचाई विभाग में व्याप्त भ्रष्टाचार की वजह से जनपद के आला-अधिकारियों द्वारा स्वयं मुनादी कर गांव खाली कराने का आदेश देना पड़ा। 

कब-कब कितना धनराशि लगा !
यूं तो गंगा कटान का इतिहास कई दशकों पुराना रहा है, लेकिन सन 2013 से गंगा के तेवर कुछ अधिक ही तल्ख रहा है। सन 2013 की बाढ़ में जब प्रसाद छपरा बक्सी व श्रीनगर गांव हाशिये पर आ गया, तब गोपालपुर, दुबेछपरा व उदई छपरा का सुरक्षा कवच कहे जाने वाले रिंग बांध के चौड़ीकरण के नाम पर 12 करोड़ रुपये खर्च हुए। दुःखद पहलू ये रहा कि तब भी रिंग बांध को बचाया न जा सका। सन 2017 में प्रदेश सरकार द्वारा 29 करोड़ के बजट से एक स्पर व अन्य कटानरोधी कार्य हुआ, परन्तु नतीजा शून्य ही रहा। सन 2016 में बाढ़ प्रभावित इलाकों का जायजा लेने आये प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने स्थानीय लोगो को आश्वस्त किये थे कि अब यहां की एक इंच जमीन कटने नहीं दिया जाएगा। कटान प्रभावित क्षेत्र में पार्कयुपाइन और ड्रेजिंग का कार्य प्रारंभ तो हुआ, लेकिन आज तक कार्य पूर्ण ही नही हुआ।

राष्ट्रीय राज्यमार्ग-31 पर मिलता है सहारा
घर से बेघर हुए लोगो का दर्द क्या होता है, इसका बेहतर उदाहरण एनएच-31 के दोनों किनारे झुग्गी-झोपड़ी ही काफी है। बेघर हुए लोग हर एक पल अपनी जिंदगी चलाने के लिए जद्दोहद करते दिख जाएंगे। ताज्जुब तो तब होता है, जब इसी मार्ग से जनप्रतिनिधियो व प्रशासनिक अमले का काफिला हूटर बजाते हुए निकल जाता है।गंगा तटवर्ती इलाको में रहने वाले ग्रामीणों का बस एक ही सवाल है कि आखिर ये कटान कब रुकेगा?

रवीन्द्र तिवारी

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