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बलिया में बाढ़ : बन रही 2016 जैसी हालात, प्लास्टिक के टुकड़ों के नीचे गुजारा कर रही जिन्दगी


मझौवां, बलिया। बाढ़ व कटान की कहानी बहुत पुरानी है। सरकारें बदलती रही, पर उसकी परियोजनाएं नदी की धारा को नहीं बदल सकीं। हर साल करोड़ों का प्रोजेक्ट बनता है, लेकिन 'फ्लड फाइटिंग' के बगैर वह अर्थहीन ही साबित होता है। इस बार भी हालात पुरानी ही दिख रही है, जबकि गंगा नदी की लहरें नया रिकार्ड बनाने को आतुर है। और, ऐसा हुआ तो स्थिति की भयावहता की कल्पना मात्र से गंगा के पड़ोसियों का रूह कांप जा रहा है। 


बलिया-बैरिया मार्ग के दक्षिण बसे अधिकतर गांवों तक गंगा नदी पांव पसार चुकी है। यह देख लोगों को डर है कि कही वर्ष 2016 की पुनरावृति न हो, क्योंकि उस समय काफी तबाही मची थी। न सिर्फ दूबेछपरा रिंग बंधा टूटा था, बल्कि कई गांवों की जलसमाधि भी हो गई थी। इस साल ड्रेजिंग कार्य शुरू हुआ था तो गंगा के पड़ोसियों में सुरक्षा की आस जगी थी, लेकिन विभाग और ठेकेदारों की लापरवाही तथा जिला प्रशासन की उदासीनता से ड्रेजिंग कार्य रास्ते में ही 'अटक' गया। यही हालत स्परों के निर्माण में भी रही। रामगढ़ व चौबेछपरा गांव के सामने बने स्पर खुद के अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे है। इन स्परों की रक्षा 'फ्लड फाइटिंग' से की जा रही है। लेकिन नदी की बलखाती लहरें लगातार दबाव बनाए हुई है। उधर, सुघरछपरा गांव को नदी अपनी कटार रूपी धार से घेरने लगी है। यह देख लोग सुरक्षित ठिकाना तलाशने लगे है। एनएच-31 पर कुछ दूर तक प्लास्टिक का टेंट जगह-जगह दिख रहे है, जिसके नीचे लहरों से चोट खाई लाचार जिंदगी कल को लेकर चिंतित दिख रही है। 

हरेराम यादव

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