To Learn Online Click here Your Diksha Education Channel...


ads booking by purvanchal24@gmail.com

बलिया : कोरोना काल में बदले लोकगीतों के मुखड़े, पढ़कर नहीं रोक पायेंगे हंसी


यूं तो कोरोना महामारी ने इस दौर में मानवीय जीवन के हर पहलू को प्रभावित किया है।मानव के रहन-सहन से लेकर आपस का मेलजोल सबकुछ वायरस विशेषज्ञों द्वारा निर्धारित गाइडलाइन पर निर्भर है। इस सबसे अलग एक और विशेष बदलाव हुआ है, वो ये की मांगलिक कार्यक्रमों के दौरान महिलाओं द्वारा गाये जाने वाले लोकगीतों के मुख्य मुखड़े का बदलाव। 

विदित हो कि पूर्वांचल के वैवाहिक संस्कृति में गीत का काफी महत्वपूर्ण स्थान होता है।तिलक से लेकर विवाह के समय तक हर रीति-रिवाज का अलग-अलग गीत होता है। कोरोनाकाल के आयोजनों में इन दिनों जगह-जगह अमंगल कर रहे कोरोना पर जीत के लिए ऐसे ही जागरूकता भरे गीतों के मधुर स्वर सुनाई देने लगे है। इन गीतों के जरिये बरातियों-घरातियों को शारीरिक दूरी सहित मास्क व सेनेटाइजर की महत्व बताया जा रहा है। वर व कन्या के चुमावन गीत वैसे तो काफी कर्णप्रिय होते है, लेकिन आजकल 'अगल से चुमइह चाची-बगल से चुमइह हो, सोना अइसन दूल्हा के कोरोना जनि छूअइह हो।' बरबस ही अपनी ओर ध्यान खिंच लेता है। 

वही बरात आगमन के दौरान 'आपन खोरिया सेनेटाइज करवाव ए फलाना बाबा, आव तारे दूल्हा ताहारा।' सेनेटाइजर के लाभ की तरफ इशारा करता है। वैवाहिक कार्यक्रम में द्वार-पूजन, गुरहथि में भसुर के लिए गाली हो या तिलक में लड़की पक्ष वालो के लिए गाली गीत हो, सभी गीतों के बोल अब बदल चुके है। आंगन में तिलक के दौरान महिलाओं द्वारा गाया गीत 'भगब की फइलब कोरोना, अंगनवा सेनेटाइज कइल ना ह।' सुनकर बरबस ही इस संकटकाल में भी मुस्कराहट आ जाती है। ऐसे तो बहुत से गीतों के मुखड़े बदल चुके है, लेकिन यहां कुछ चुनिंदा गीतों का ही उल्लेख किया गया है। कुछ भी हो मानसिक तनाव भरे इस कोरोनाकाल में ये गीत हमें गुदगुदाकर मन तो हल्का कर ही रहे है।

गीत खुद रचती है महिलाएं
सुनकर आश्चर्य होगा कि इन गीतों के रचयिता खुद ग्रामीण महिला ही होती है, जो आपस में चर्चा कर एक-एक कड़ी जोड़कर पुराने धुनों में पिरोकर एक पूरा गीत बनाती है।

समस्यात्मक मूल होते है गीत
वैवाहिक कार्यक्रम के दौरान गाये जाने वाले गीतों में अमूमन वर्तमान समस्या प्रधान गीत का पुट मिलता है। इससे पहले दहेज प्रथा व बेटी विदाई की कसक वाले गीतों का बोलबाला रहता था। अब जबकि कोरोना महामारी के दौर में खुद से बचना भी है और दूसरों को जागरूक कर बचाना भी है तो बेशक ये गीत काफी रोचक है। सवाल ये है कि क्या कभी ऐसे अनाम गीतकारों को कोई प्लेटफार्म मिल सकता है ?

रवीन्द्र तिवारी

Post a Comment

0 Comments